मंगलवार, 31 अगस्त 2010

उत्तरांचली धर्म मंडल पंजाब (रजि.) मासिक कार्यकारिणी बैठक एजेंडा

आदरणीय बंधुवर 
श्री बद्रीनाथ प्रभु की कृपा से आप सभी परिवार सहित सकुशल से होगें ऐसी कामना करते हैं। आगे  उत्तरांचली धर्म मंडल अपनी गतिविधियों को गति प्रदान करते हुए मासिक कार्यकारिणी बैठक का आयोजन तिथि 20 feb 2011 को teacher home  में सुबह दस बजे से एक बजे तक किया जा रहा है। इस बैठक में सामान्य विष्यों के इलावा आगामी योजनाओं को लेकर विचार विर्मश किया जाना है। सो सभी कार्यकर्ताओं से अपील है कि वह समय पर बैठक में उपस्थित होकर मंडल की गतिविधियों को सुचारु ढंग से चलाने व उसे गति प्रदान करने में अपना सहयोग दे। बैठक में विभिन्न मंडलों में अब तक हुई सदस्यता का हिसाब लेकर जरूर आए वही जिन बंधुओं के पास मंडल का बकाया धन हो वह महासचिव जी व कोषध्यक्ष के पास जमा करवाकर रसीद हासिल करे। धन्यवाद सहित।

हरिदत्त जोशी                                                       चतुर सिंह नेगी
प्रधान                                                                   महासचिव 

सोमवार, 30 अगस्त 2010

स्थानीय देवता

सत्यनाथ :
यह संभव है कि सत्यनारायण से इनका संबंध हो।  यह सिद्ध सत्यनाथ या सिद्ध भी कहलाते हैं।  इनकी पूजा गढ़वाल में ज्यादा होती है।  कुमाऊँ में मानिला में ही एक मंदिर इस देवता का है।
भोलानाथ :
'भ्वालनाथ' कहे जाते हैं।  इनकी स्री बमी कहलाती है।  इनको कुछ लोग महादेव का अंग तथा बमी को शक्ति का अंश मानते हैं।  परन्तु इनके उत्पत्ति की कहानी इस प्रकार है - राजा उदयचंद की दो रानियाँ थी, जिनमें से प्रत्येक के एक पुत्र था।  जब दोनों बड़े हुए तो बड़ा राजकुमार बुरी संगति में पड़ने से राज्य से निकाला गया।  छोटा राजकुमार ज्ञानचंद के नाम से गद्दी पर बैठा।  थोड़े दिनों में बड़ा राजकुमार साधु के भेष में अल्मोड़ा आकर नैल पोखर में ठहरा।  वह पहचाना गया।  राजा ज्ञानचंद ने यह समझकर की कहीं गद्दी छिनने को न आया हो, एक बड़िया माली द्वारा उसको तथा उसकी गर्भवती स्री को मार डाला।  राजकुमार की स्री ब्राह्मणी थी।  उससे उन्होंने नियोग कर लिया था।  मृत्यु के बाद वह राजकुमार भोलानाथ केे नाम से भूत हो गया।  ये तीनों भूत अल्मोड़ा को लोगों को सताने लगे, ज्यादातर बड़िया लोगों को।  तब अल्मोड़ा में आठ भैरव मंदिरों का निर्माण हुआ -
१. काल भैरव
२. बटुक भैरव
३. भाल भैरव
४. शै भैरव
५. गढ़ी भैरव
६. आनंद भैरव
७. गौर भैरव
८. खुटकूनियाँ
दूसरी कहानी यह है कि कोई फकीर किसी प्रकार दरवाजा बंद होने पर भी रनवास में चला गया, जहाँ राजा व रानी बैठे थे।  राजा ने क्रोध में आकर उस फकीर को मार डाला।  राजा को भूत चिपट गया।  वह सो न सका, चारपाई से नीचे गिराया गया।  चारपाई ऊपर हो गई।  तब राजा ने पंडितों की राय से ये मंदिर बनवाये।
गंगानाथ :
यह शुद्रों का प्रिय देवता है।  डोटी के राजा वैभवचंद का पुत्र पिता से लड़कर साधु हो गया।  घूमता-घामता वह पट्टी सालम के अदोली गाँव में एक ब्राह्मण जोशी की स्री के प्रेम-पाश में फँस गया।  जोशी अल्मोड़ा में नौकर था।  जब उसे मालूम हुआ, तो उसने झपरुवा लोहार की सहायता से अपनी गर्भवती स्री तथा उसके राजकुमार साधु प्रेमी को मरवा डाला।  भोलानाथ की तरह ये तीन प्राणी भी भूत हो गये।  अत: उन्होंने इनका मंदिर बनवाया।
कहते हैं, गंगानाथ बच्चों व खूबसूरत औरतों को चिपटता है।  जब कोई भूत-प्रेत से सताया जावे या अन्यायी के फंदे में फँस जावे, तो वह गंगानाथ की शरण में जाता है।  गंगानाथ अवश्य रक्षा करते हैं।  अन्यायी को दंड देते हैं।  गंगानाथ को पाठा (छोटा बकरा), पूरी, मिठाई, माला, वस्र या थैली, जोगियों की बालियाँ आदि चीजें चढ़ाई जाती हैं।  उसकी स्री भाना को अंग (आंगड़ी), चदर और नथ और बच्चे को कोट तथा कड़े व हसुँली।
मसान खबीस :
ये शमशान के भूत हैं, जो प्राय: दो नदियों के संगम में होते हैं।  काकड़ीघाट तथा कंडारखुआ पट्टी में कोशी के निकट इनके मंदिर भी हैं।  जिस किसी को भूत लगने का कारण ज्ञात न हो, तो वह मसान या खबीस का सताया हुआ कहा जाता है।  मसान काला व कुरुप समझा जाता है।  वह चिता-भ से उत्पन्न होता है।  लोगों के पीछे दौड़ता है।  कोई उसके त्रास से मर जाते हैं, कोई बीमार हो जाते हैं, कोई पागल।  जब किसी को मसान लगा तो 'जागर' लगाते हैं।  कई लोग नाचते हैं।  भूत-पीड़ित मनुष्य पर उर्द व चाँवल जोर से फेंकते हैं।  बिच्छु घास भी लगाते हैं।  गरम राख से अंगारे फेंकते हैं।  भूत-पीड़ित मनुष्य कभी-कभी इन उग्र उपायों से मर जाता है।  खबिस भी मिसान ही सा तेज मिजाज वाला होता है।  वह अँधेरी गुफाओं, जंगलों में पाया जाता है।  कभी वह भैंस की बोली बोलता है कभी भेड़-बकरियों या जंगली सुअर की तरह चिल्लाता है।  कभी वह साधु भेष धारण कर यात्रियों के साथ चल देता है।  पर उसकी गुनगुनाहट अलग मालूम होती है।  यह ज्यादातर रात को चिपटता है।
ग्वाल :
इसको गोरिल, गौरिया, ग्वेल, ग्वाल्ल या गोल भी कहते हैं।  यह कुमाऊँ का सबसे प्रसिद्ध व मान्य ग्राम-देवता है।  वैसे इसके मंदिर ठौर-ठौर में है, पर ज्यादा प्रसिद्ध ये हैं।  बौरारौ पट्टी में चौड़, गुरुड़, भनारी गाँव में, उच्चाकोट के बसोट गाँव में, मल्ली डोटी में तड़खेत में, पट्टी नया के मानिल में, काली-कुमाऊँ के गोल चौड़ में, पट्टी महर के कुमौड़ गाँव में, कत्यूर में गागर गोल में, थान गाँव में, हैड़ियागाँव, छखाता में, चौथान रानीबाग में, चित्तई अल्मोड़ा के पास।
ग्वाल देवता गी उत्पत्ति इस प्रकार से बतायी जाती है - चम्पावद कत्यूरी राजा झालराव काला नदी के किनारे शिकार खेलने को गये।  शिकार में कुछ न पाया।  राजा थककर और हताश होकर दूबाचौड़ गाँव में आये।  जहाँ दो भैंस एक खेत में लड़ रहे थे।  राजा ने उनको छुड़ाना चाहा पर असफल रहे।  राजा प्यासा था।  एक नौकर को पानी के लिए भेजा, पर पानी न मिला, दूसरा नौकर पानी की तलाश में गया।  उसने पानी की आवाज सुनी, तो अपने को एक साधु के आश्रम के बगीचे में पाया।  वहाँ आश्रम में जाकर देखा कि एक सुन्दर स्री तपस्या में मग्न है।  नौकर ने जोर से पुकारा, और स्री की समाधि भंग कर दी।  औरत ने पूछा कि वह कौन है?  स्री ने धीरे-धीरे आँखे खोली और नौकर से कहा कि वह अपनी परछाई  उसके ऊपर न डाले, जिससे उसकी तपस्या भंग हो जाय।  नौकर ने स्री को अपना परिचय दिया, और अपने आने का कारण बताया।  तथा झरने से पानी भरने लगा। तो घड़े का छींट स्री के ऊपर पड़ा तब उस तपस्विनी ने उठकर कहा कि जो राजा लड़ते भैसों को छुड़ा न सका, उसके नौकर जो न करे, सो कम।  नौकर को इस कथन पर आश्चर्य हुआ।  उसने स्री से पूछा कि वह कौन है?  तपस्विनी ने कहा - "उसका नाम काली है, और व राजा की लड़की है।  वह तपस्या कर रही है।  नौकर ने आकर उसकी तपस्या भंग कर दी।' राजा उस पर मोहित हो गये, और उससे विवाह करना चाहा।  राजा उसके चाचा के पास गये। देखा - वह एक कोढ़ी था।  पर राजा काली पर मोहित थे।  उन्होंने उस कोढ़ी को अपने सेवा-सुश्रुषा से संतुष्ट कर लिया, और वह विवाह को राजी हो गया।  अपने चाचा की आज्ञास से उस स्री ने राजा से विवाह कर लिया।  काली रानी गर्भवती हुई। राजा ने रानी से कहा था कि जब प्रसव पीड़ा हो तो वह घंटी बजावे।  राजा आ जाएगा।  रानियों ने छल से घंटी बजाई।  राजा आये, पर पुत्र पैदा न हुआ।  राजा फिर दौरे में चले गए।  रानी के एक सुन्दर पुत्र पैदा हुआ।  अन्य रानियों ने ईर्ष्या के कारण पुत्र को छिपा लिया।  काली रानी की आँखों में पट्टी बाँधकर उसके आगे एक कद्दुू रख दिया।  रानियों ने लड़के को नमक से भरे एक पिंजरे में बन्द कर दिया। पर आश्चर्य है कि नमक चीनी हो गया।  और बच्चे ने उसे खाया।  इधर रानियों ने बच्चे को जिन्दा देखकर पिंजरे को नदी में फेंक दिया।  वहाँ वह मछुवे के जाल में फंसा।  मछुवे के सन्तान न थी।  ईश्वर की देन समझकर वह सुन्दर राजकुमार को अपने घर ले गया।  लड़का बड़ा हुआ और एक काठ के घोड़े पर चढ़कर उस घाट में पानी पिलाने को ले गया, जहाँ वे दुष्ट रानियाँ पानी भरने को जाती थीं।  उनके बर्तन तोड़कर कहने लगा कि वह अपने काठ के घोड़े को पानी पिलाना चाहता है।  वे हँसी, और कहने लगी की क्या काठ का घोड़ा भी पानी पीता है?  उसने कहा कि जब स्री को कद्दुू पैदा हो सकता है तो काठ का घोड़ा भी पानी पीता है।  यह कहानी राजा के कानों में पहुँची।  राजा ने लड़के को बुलाया।  लड़के ने रानियों के अत्याचार की कहानी सुनाई।  राजा ने सुनकर रानियों को तेल की कढ़ाई में पकाये जाने का हुक्म दिया।  बाद में वह राजकुमार राजा बना।  वह अपने जीवन-काल में ही पिछली बातों को जानने के कारण पूजा जाता था।  मृत्यु के बाद तमाम कुमाऊँ में माना जाने लगा।  वह लोहे का पिंजरा गौरी-गंगा में फेंका गया था।
क्षेत्रपाल या भूमियाँ :
यह खेतों का तथा ग्राम सरहदों का छोटा देवता है।  यह दयालु देवता है।  यह किसी को सताता नहीं।  हर गाँव में एक मंदिर होता है।  जब अनाज बोया जाता है या नवान्न उत्पन्न होता है, तो उससे इसकी पूजा होती है, ताकि यह बोते समय ओले (डाल बायल) या जंगली जन्तुओं से उनका बचाव करे, और भंडार में जब अन्न रखा जाये, तो कीड़े और चूहों से उसकी रक्षा करें।  यह न्यायी देवता है।  यह अच्छे को पुरस्कार तथा धूर्त को दंड देता है।  गाँव की भलाई चाहता है।  विवाह, जन्म या उत्सव में इसकी पूजा होती है।  रोट व भेंट चढाई जाती है।  यह सीधा इतना है कि फल-फूल से भी संतुष्ट हो जाता है। जागीश्वर में क्षेत्रपाल का मंदिर है।  वहाँ वह झाँकर-क्षेत्र का रक्षक माना जाता है और झाँकर सैम कहलाता है।  (सैम शब्द स्वयंभू शब्द का अपभ्रंश है, जो नेपाल में बुद्ध का नाम है - अठकिन्सन) कभी यहाँ बकरे भी मारे जाते हैं।  बौरारौ में भी एक मंदिर है।  सैम व क्षेत्रपाल के कर्तव्यों में कुछ भेद है।  पर यह भी भूत-कक्षा मंे।  कभी-कभी वह लोगों को चिपट जाता है जिसका निशान यह है कि सिर के बालों की जटा बन जाती है।  काली कुमाऊँ में सैमचंद भूत हरु का अनुगामी माना जाता है।
ऐड़ी या ऐरी :
कुमाऊँ के जमींदारों में एक जाति ऐड़ी या ऐरी है।  इस जाति का एक मनिष्य बड़ा पहलवान व बली हुआ।  उसको शिकार खेलने का बहुत शौक था।  वह जब मरा, तो भूत हो गया।  बालकों व स्रियों को चिपटने लगा।  जब उनके बदन में नाचने लगा, तो कहने लगा कि 'वह ऐड़ी या ऐरी है।  उसको हलुवा, पूरी, बकरा वगैरह चढ़ाकर उसकी पूजा करो, तो वह बालको व औरतों को छोड़ देगा"  अब तमाम लोगों में वह इस प्रकार पूजा जाने लगा।  जगह-जगह में उसके मंदिर भी बन गये।  काली कुमाऊँ में इसके मंदिर बहुत हैं। लोग कहते हैं कि ऐड़ी डांडी में चढ़कर बड़े-बड़े मंदिरों में शिकार खेलता है।  ऐड़ी की डांडी ले जाने वाले 'साऊ भाऊ' कहलाते हैं।  जो उसके कुत्ते का भौंकना सुनेगा, वह अवश्य कुछ कष्ट पायेगा।  ये कुत्ते ऐड़ी के साथ में रहते हैं।  उनके गलों में घंटी लगी रहती है।  जानवरों को घेरने के लिए और भूत भी साथ चलते हैं, जिनको परी कहते हैं।  ये 'आँचरी कींचरी' भी कहलाती हैं।  हथियार ऐड़ी का तीर व कमान है।  कभी-कभी जंगल में बिना जख्म का कोई जानवर मरा हुआ पाया जाता है, तो उसे ऐड़ी का मारा हुआ बताते हैं।  यह भी कहते हैं कि कभी-कभी ऐड़ी का चलाया हुआ तीर आले (मकान से धुवाँ निकलने के छेद) में से मकान के भीतर घुस जाता है।  जब किसी मनुष्य को वह लगता है, तो कहते हैं कि लुंज-पुंज हो जाता है।  उसकी कमर टूट जाती है।  बदन सूख जाता है।  हाथ-पैर कांपने लगते हैं।  यह बाबत पहाड़ी किस्सा है। 'डालामुणि से जाणो, जाला मुणि नी सेणो"।  पेड़ के नीचे सो जाना, पर आले के नीचे न सोना चाहिए।
ऐड़ी की सवारी कभी-कभी लोग देखते भी है।  झिजाड़ गाँव का एक किसान किसी काम को गाँव से बाहर गया था।  चाँदनी रात थी।  एकाएक कुत्तों के गले में बँदी घंटी व जानवरों को घेरने की आवाज आई।  किसान ने पहचाना की वह ऐड़ी है।  उसने उसकी डांडी पकड़ ली।  छोड़ने को बहुत कहा, पर उस वीर किसान ने न छोड़ा।  तब वरदान मांगने को कहा।  उसने कहा कि यह वरदान माँगता हूँ कि देवता की सवारी उनके गाँव में नहीं आये।  ऐड़ी ने स्वीकार किया।  कहते हैं कि यदि किसी पर ऐड़ी की न पड़ गई, तो वह मर जाता है, पर ऐसा कम होता है, जो अस्र-शस्रों से सुसज्जित रहते हैं।  ऐड़ी का थूक जिस पर पड़ गया, तो विष बन जाता है।  इसकी दवा 'झाड़-फूँक' है।  ऐड़ी को सामने-सामने देखने से मनुष्य तुरंत मर जाता है, या उसकी आँखों की ज्योति भ हो जाती है, या उसे कुत्ते फाड़ डालते हैं, या परियाँ (आँचरी, कींचरी) उसके कलेजे को साफ कर देती है।  अगर ऐड़ी को देखकर कोई बच जावे, तो वह धनी हो जाता है।  ऐड़ी का मंदिर जंगल में होता है। वहाँ एक त्रिशूल गाड़ा रहता है, जिसके इधर-उधर दो पत्थर रहते हैं, जिन्हें माऊ कहते हैं, और आँचरी, कींचरी भी कहते हैं।  दो दफे नहाते व एक दफे भोजन करते हैं।  किसी को छूने नहीं देते।  इसको दूध, मिठाई, पूरी, नारियल वा बकरा चढ़ाया जाता है।  लाल वस्र खून में रंगाकर वहाँ पर झंडे को तौर पर गाड़ा जाता है।  पत्थरों की पूजा होती है, तब सभी लोग पूरी-प्रसाद खाते हैं।  कहीं-कहीं कुँवार (आश्विन) की नवरात्रियों में भी पूजन होता है।
कलविष्ट :
लगभग २०० वर्ष की बात है कि कोटयूड़ी का पुत्र कलू कोटयूड़ी नाम का एक राजपूत पाटिया ग्राम के पास कोटयूड़ा कोट में रहता था।  उसकी माता का नाम दुर्पाता (द्रोपदा) था।  उसके नाना का नाम रामाहरड़ था।  वह बड़ा वीर व रंगीला नौजवान था।  वह किसान था, पर राजपूत होने पर भी ग्वाले का काम करता था।  वह बिनसर के जंगल में गायें चराता था नदी में नहाने (खाल बैठने) को ब्रह्मघाट (कोशी) में जाता था।
उसके पास ये सामान बताया जाता है -'मुरली, बाँसुरी, मोचंग, परवाई, रमटा, घुंघरवालो, दातुले, रतना, कामली, झपुवा, कुत्तो लखमा, बिराली, खनुवा, लाखो रुमोली, घुमेली, गाई, झगुवा, रांगो (भैंसा), नागुली, भागुली भैंसी, सुनहरी दातुलो, बाखुड़ी भैंस।'
कलविष्ट मुरली खूब बजाता था।  बिनसर में सिद्ध गोपाली के यहाँ दूध पहुँचाता था, और साथ ही श्री कृष्ण पांडेजी की नौलखिया पांडेजी से लड़ाई थी।  वे देश से 'भराड़ी' नामक एक प्रकार के भूत को इस गरज लाये कि वह श्री कृष्ण पांडेजी के खानदान को नष्ट कर दे।  पर कलवृष्ट एक वीर पुरुष था।  वह भूतों को भगाता था।  'भराड़ी' को भी उसने एक नदी (त्यूनरीगाड़) में एक पत्थर के नीचे दबा दिया, और हर तरह से श्री कृष्ण की मदद करता था।  बाद में प्रार्थना करने पर 'भराड़ी' को छोड़ दिया।  नौलखिया पांडे इस प्रकार अपने कार्य में सफलीभूत न होने पर रुष्ट हुआ, और उसने एक चाल चली, जिससे श्री कृष्ण पांडे और कलविष्ट के बीच लड़ाई हो जाए।  उसने यह झूठी खबर उड़ाई कि कलविष्ट श्री कृष्ण पांडेसे गुप्त रुप से मिला है।  श्री कृष्ण दिल में जानता था कि उसकी स्री निर्दोष है, तथापि लोकापवाद को दूर करने के गरज से उसने कलविष्ट को मारने की ठहराई।  श्री कृष्ण राजा का पुरोहित था।  उसने राजा से कलविष्ट की शिकायत की, और उसे मारने को कहा।  राजा ने सभी जगह पत्र भेजे तथा पाँच पान के बीड़े भेजे कि देखें कौन कलविष्ट को मारने का बीड़ा उठाता है।
जयसिंह टम्टा ने बीड़ा उठाया।  राजा ने कलविष्ट को सादर दरबार में बुलाया।  उस दिन श्राद्ध था, उससे दही - दूध लेकर आने को कहा।  कलविष्ट बड़े-बड़े बर्तनों (ठेकों व डोकों) में इतना दही-दूध लेकर गया कि राजा चकित हो गया।  राजा ने कलविष्ट को देखा उसके माथे में त्रिशूल और पैर में पद्म का फूल था।  वह बड़ा वीर और सच्चरित्र पुरुष ज्ञात हुआ। राजा ने कहा, वह उसे न मारेगा।  उसने बड़ी-बड़ी करामते दिखाई। राजा ने एक दिन उसके तथा जयसिंह टम्टा के बीच कुश्त ठहराई।  नाक काटने की शर्त पर कुश्ती ठहरी। राजा, रानी तथा दरबारियों का सामने कुश्ती हुई। कलविष्ट ने जयसिंह टम्टा को चित्त कर दिया, और नाक काट डाली।  दरबार में धाक बैठ गई।  कलविष्ट से बहुत से लोग जलने लगे।  उन्होंने उसे मारने की ठहराई।
दयाराम पछाइ (पालीपछाऊँ के रहने वाले) ने कहा कि कलविष्ट अपने भैसों को लेकर चौरासी माल (तराई भावर) में जावे तो अच्छा हो, वहाँ भैसों के धरने के लिए अच्छा स्थान है।  पर दिल में यह कपट था कि वह (तराई भावर) में खत्म हो जाएगा, या वहाँ मुगलों द्वारा मारा जाएगा।
कलविष्ट नथुवाखान, रामगाड़, भीमताल होकर भावर में गया।  वहाँ १६०० मंगोली सेना उसे मिली।  उनके नेता सूरम व भागू पठान थे।  साथ ही श्री गजुबा ढ़ींगा तथा भागा कूर्मी भी उक्त पठानों से मिल गये।  सब ने उसे मारने की धमकी दी।  उन्होंने उसकी ताकत आजमाने को उससे एक बड़ी बल्ली (भराणे) उठाने को कहा।  उसने उठा दिया।  उन्होंने प्रपंच रचा।  मेला किया।  गुप्त रुप से हथियार एकत्र किये।  उसके बिल्ली-कुत्तों ने गुप्तचर का काम किया।  उसको सूचना दे दी।  मेले में कलविष्ट ने कहा कि वह पहाड़ी नाच दिखाएगा, उसने उस बड़ी बिल्ली को उठाकर चारों ओर घुमाया, और अपने दुश्मनों को ठंडा कर दिया।  तब वह चौरासी माल को गया।  कलविष्ट ने वहाँ के सब शेरों को जो ८४ की संख्या में थे मार डाला।  बड़े शार्दूल (गाजा केसर) को खनुवा लाखे ने मार डाला।
चौरसी से चलकर कलविष्ट पालीपछाऊँ दयाराम के यहाँ गया।  उसने कहा कि चौरासी तो अच्छी है, पर शेर बहुत हैं।  दयाराम ने पूछ-ताछ की, तो सब शेर मरे हुए पाए गये।  कलविष्य ने दयाराम को दगा करने के लिए श्राप दिया कि उसने छल करके उसे चौरासी माल भिजवाया था, पर वह बच गया।  अब यदि कपट से मारा जाएगा, तो वह भूत बनकर पालीपछाऊँ के लोगों को चिपटेगा।  इस समय कलविष्ट की पूजा पालीपछाऊँ में ज्यादा होती है।
फिर कलविष्ट कपड़खान में आया।  यहाँ काठघर में रहना शुरु किया।  वहाँ रात को 'दोष' एक प्रकार के भूत ने तंग किया।  भैंसो को दुहने न दिया।  रात भर कलविष्ट की 'दोष' से लड़ाई हुई।  'दोष' प्रात: काल हार गया।  कलविष्ट ने उससे वचन लिया कि वह किसी को तंग न करे, बल्कि भूले-भटके को रास्ता दिखाए।
जब अनेक प्रपंच करने पर भी वीर कलू कोटयूड़ी न मरा, तो श्री कृष्ण ने लखड़योड़ी नामक उसके साढ़ को बहकाया कि वह किसी तरह छल (चाला) करके उसे मारे।  लखड़योड़ी ने एक भैंस के पैर में कील ठोंक दी।  तब कलू कोटयूड़ी से मिलने गया।  कलू कोटयूड़ी ने आने का कारण पूछा, तो उसने कहा कि वह भैंस माँगने आया है।  इसने कहा कि जितने चाहिए लखड़योड़ी ले जावे।  पर लखड़योड़ी ने कहा कि भैंस के पै में क्या हो रहा है?  देखा, तो मेख ठुकी हुई थी।  कलू कोटयूड़ी ने दाँस से मेख निकालनी चाही, तो लखड़योड़ी ने खुकरी से कलू कोटयूड़ी के दोनों पैर काट दिए गये।  कोटयूड़ी ने भी लखड़योड़ी को मार डाला और श्राप दिया कि उसने दगाबाजी से मारा है, उसके खानदान में कोई नहीं रहेगा।
चौमू :
यह चौपायों की रक्षा तथा विनाश करने वाला छोटा ग्राम - देवता है।  इसका आदि स्थान स्यूनी तता द्वारसौं के बीच है। १५वीं शताब्दी के मध्य में एक ठा. रणबीर राना नाव देश्वर का लिंग लेकर चंपावत से अपने घर को आ रहे थे, जो कि रानीखेत के पास था।  किंरग राणा साहब की पगड़ी में बँधा था।  धारीघाट के पास उन्होंने पानी के निकट पगड़ी उतारी। हाथ-मुँह धोकर पगड़ी उठाने लगे, न उठी।  सभी लोग मिलकर कठिनाई से लिंग व पगड़ी को उठाकर एक बाँझ के पेड़ के खंडहर में रखा, ताकि उसा मंदिर बनाया जाए; पर लिंग उस जगह से असंतुष्ट होकर पहाड़ के ऊपर दूसरे पेड़ पर चला गया।  पहला पेड़ स्यूनी गाँव में था।  दुसरा स्यूनी-द्वारसौ की सरहद पर था।  अत: दोनों गाँव के लोगों ने मिलकर वह मंदिर बनाया और इसकी भेंट के हकदार भी दोनों गाँव हैं।  अल्मोड़ा के राजा रत्नचंद ने यह बात सुनी और वे लिंग के दर्शन को जाने को थे कि अच्छा मुहूर्त न मिला। तब सपने में चौमू ने राजा से कहा - मैं राजा हूँ, तू नहीं है। तू मेरी क्या पूजा करेगा!
चौमू के मंदिर में सैकड़ों घंटे चढ़ाये जाते हैं।  असोज व चैत्र की नवरात्रियों में सैकड़ों दीपक जलाये जाते हैं, और बड़ी पूजा होती है।  लिंग में दूध डाला जाता है।  बकरियाँ मारी जाती हैं।  उनके सिर (मुनी) स्यूनी व द्वारसौके लोग आपस मे बाँट लेते हैं।  चौमू के दरबार में कसमें ली जाती हैं।  अब कलिकाल में पुराना चमत्कार तो नहीं रहा, तथापि जिनकी गायें या डांगर खो जाते हैं, वे चौमू की पूजा देने पर उन्हें पा जाते हैं।  जिनकी गाय व भैंसे गाबिन हैं, वे चौमू की अराधन कर जीते बच्चे गाय-भैंस के हासिल करते हैं।  जो बुरा दूध चौमू को चढ़ाते हैं, उनके डंगर मर जाते हैं।  जो नहीं चढ़ाते या लिंग पूजा नहीं करते, उनके दूध का दही नहीं जमता (चुपड़ा नहीं होता) बछेड़ा होने पर १० दिन तक गाय का दूध चौमू पर चढ़ाना मना है।  शाम को बी गाय का दूध चढ़ाना वर्जित है।  जिन्होंने ऐसा दूध चढ़ाया है, उनकी गायें मर गयी हैं, उनके गायों के खूंटों की पूजा चौमू की तरह करनी चाहिए, अन्यथा डंगरों की हानि होगी।  स्यूनी द्वारसौं से गाय खरीदने वालों को चौमू की पूजा अनिवार्य है।  जो गाय चौमू को चढ़ाई हो, उसका दूध शाम को नहीं पिया जाता, पर और देवताओं को चढ़ाई हुई गायों का दूध पिया जा सकता है।
बधाणा :
चौमू की तरह यह भी गायों का देवता है।  वह किसी को चिपटता नहीं और न पूजने पर सताता है।   गाय के बच्चा होने के ११वें दिन उसका पूजन होता है।  पहले जल से उसकी मूर्ति साफ की जात है, फिर दूध चढ़ाया जाता है तब भात, पूरी, प्रसाद व दूध नैवेद्ध लगाया जाता है।  तभी गाय का दूध पिया जाता है।  यहाँ बलिदान नहीं होता।
हरु :
एक अच्छी प्रकृति का देवता है, और कुमाऊँ के ग्रामों में बहुत पूजा जाता है।  कहा जाता है कि वह चंपावत कुमाऊँ का राजा हरिशचन्द्र था।  वह राजा राजपाट छोड़ हरिद्वार में जाकर तपस्वी हो गया।  कहते हैं कि हरिद्वार में हर की पौड़ी उसी ने बनाई।  हरिद्वार से कहा जाता है कि उसने चारों धामों (बद्रीनाथ, जगन्नाथ, रामनाथ, द्वारिकानाथ) की परिक्रमा की।  चारों धामों से लौटकर चंपावत में राजा ने अपना जीवन धर्म-कर्म में ही बिताया, और अपना एक भ्रातृमंडल कायम किया।  उसके भाई लाटू तथा उनके नौकर स्यूरा, त्यूरा, रुढ़ा कठायत, खोलिया, मेलिया, मंगिलाया और उजलिया सब उनके शिष्य हो गये।  सैम व बारु भी चेले बने।  राजा उनका गुरु हो गया। 
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उत्तरांचल कुमाऊँनी लोक-साहित्य

कुमाऊँ का लोक-साहित्य अत्यन्त समृद्ध है । गीतों की दृष्टि से कुमाऊँ का लोक-साहित्य विशेष रुप से जन-जन को आकर्षित करता है । कुमाऊँनी लोक साहित्य सात प्रकार के माने जाते हैं -

१. लोकगीत
२. कथा गीत
३. लोक-कथाएँ
४. कथाएँ
५. लोकोक्तियाँ
६. पहेलियाँ और अन्य रचनाएँ

डॉ. कृष्णानन्द जोशी ने अपने 'कुमाऊँ का लोक साहित्य' में प्रमुख वर्गों में कुमाऊँनी लोक साहित्य को बाँटकर अपने कथन की पुष्टि इस प्रकार की है ।

पद्यात्मक गीत

१. धार्मिक गीत
धार्मिक गीतों की सँख्या कुमाऊँ में अधिक है । धार्मिक गीतों में पौराणिक आख्यानों वाले गीतों का प्रथम स्तर पर लिया जा सकता है । ऐसे गीतों में दक्ष प्रजापति के यज्ञ से लेकर रामायण, महाभारत के अनेक अवसरों के गीत आ जाते हैं । ऐसे गीतों का क्रम बहुत लम्बा चलता है । पौराणिक देवी-देवताओं के सभी गीत इस क्षेत्र में गाये जाते हैं ।

धार्मिक गीतों के अन्तर्गत स्थानीय देवी-देवताओं को भी स्थान मिला है । इन्हों जागर गीत के नाम से जाना जाता है । गढ़वाल-कुमाऊँ में 'जागरों' का विशेष महत्व है । जागरी, ढोल, हुड़का, डौंर-थाली बजाकर देवता विशेष के जीवन व कार्यों का बखान गीत गाकर करता है । जिस व्यक्ति पर 'देवता' विशेष अवतरित होता है - वह डंगरिया कहलाता है । जागरी जैसे-जैसे वाद्य बजाकर देवता विशेष के कार्यों का उल्लेख करता हुआ गाता है - वैसे-वैसे ही 'औतारु' (डंगरिया) नाचता जाता है । उसके शरीर में एक विशेष प्रकार की 'कम्पन शक्ति' प्रवेश करती है । जन-मानस मनौती मनाकर देवता को जागरी से नचवाते हैं और देवता को नाचने पर विपत्ति को टली हुई मानते हैं । आश्विन के महीने में ऐसे 'जागर' लगाये जाते हैं । स्थानीय देवी-देवताओं का पूजन 'बैसी' कहलाता है । जागरों में ग्वेल, गंगनाथ, हरु, कव्यूर, भोलानाथ, सेम और कलविष्ट आदि के जागर विशेष रुप से प्रसिद्ध हैं ।

२. संस्कार गीत
संस्कार गीतों को यदि नारी-हृदय के गीत कहें तो अत्युक्ति न होगी । जन्म, छठी, नामकरण, यज्ञोपवीत तथा विवाह आदि के गीत संस्कार गीतों की श्रेणी में आते हैं । जिन्हें महिलाएँ अपने कोमल कण्ठ से बड़े प्यार से गाती हैं । 'स्वकुनाखर' (शकुन गीत) ऐसा गीत होता है जो प्रत्येक मंगल कार्य के अवसर पर गाया जाता है । गढ़वाल में 'मांगलगीत' इसी प्रकार का गीत है ।

३. ॠतु गीत
ॠतु-त्यौहार के गीतों को डॉ. त्रिलोचन पाण्डेय ने मुक्तक गीतों की श्रेणी में लिया है । उन्होंने ऐसे गीतों को नौ श्रेणियों में बाँटा है - 
१. नृत्य प्रधान गीत
२. अनुभूति प्रधान गीत
३. तर्क प्रधान गीत
४. संवाद प्रधान गीत
५. स्फुट गीत
६. ॠतु गीत
७. देवी-देवता गीत
८. व्रत त्यौहार के गीत
९. कृषि गीत
ॠतु विशेष के आगमन पर ऐसे गीत गाये जाते हैं । चैत्र मास से शुरु होने वाले ऐसे गीतों को 'रितु रवैण' कहते हैं । इसके अलावा कुमाऊँ के ॠतु गीतों में 'काफलिया', 'रुड़ी', 'हिनौल' और 'होली' विशेष रुप से प्रसिद्ध हैं । फागुन के महीने में सर्वत्र होलियाँ गाई जाती हैं । गंगोली, चम्पावत, द्वाराहाट और सतराली आदि स्थानों की होलियाँ बहुत प्रसिद्ध हैं ।

४. कृषि सम्बन्धी गीत
कुमाऊँ में जब खेतों में रोपाई या गोड़ाई होती है तो वहाँ का मानव रंगीला हो जाता है । ऐसे समय जो गीत हुड़की के साथ गाये जाते हैं, उन्हें 'हुड़किया बौल' कहा जाता है । 'गुडैल' गीत गोड़ाई से सम्बन्धित है । ऐसे गीतों को गाने से पूर्व 'भूमयाल', 'कालीनर' देवों की प्रार्थना की जाता है कि वे भूमिपति के सदा अनुकूल रहैं । बाद में कथा प्रधान गीत (जैसे बौराण और मोतिया सौन का गीत) आदि गाये जाते हैं । खेती का काम ऐसे गीतों के साथ अति तीव्रता से होता रहता है ।

५. उत्सव तथा पर्व सम्बन्धी गीत
इन गीतों में आंचलिक विश्वासों और आचार-प्रथाओं का विशेष महत्व देखने में आता है । भादो शुक्ल सप्तमी और अष्टमी को कुमाऊँ की महिलाएँ, 'डोर दुबड़' का व्रत रखती हैं । 'गवरा' (गौरा) पूजन से सम्बन्धित गीत इस ब्रत के अवसर पर गाए जाते हैं । चैत्र के प्रथम दिन कन्याएँ 'फुलदेवी' का आयोजन वर्ष भर की खुशहाली के लिए करती हैं । सावन मास के पहले दिन हरियाला का त्यौहार हरियाली गीत के साथ मनाया जाता है । 'खतड़वा' का स्थानीय त्यौहार कुमाऊँ अंचल में आश्विन संक्रान्ति के दिन मनाया जाता है । मकर संक्रान्ति के दिन कुमाऊँ में 'घुघतिया' त्यौहार मनाया जाता है । इस दिन बालक एवं बालिकाएँ आटे के घुघते बनाकर कौवों को खिलाते हुए 'घुघतिया' गीत गाते हैं । 
"काले कव्वा काले, का ले का ले"

६. मेलों के गीत
कुमाऊँ के ऐसे गीत नृत्य-गीत हैं । कुछ नृत्य गीतों की शैलियाँ इस प्रकार हैं -

झोड़ा - झोड़ा सामूहिक नृत्य-गीत है । वृताकार घेरे में एक दूसरेकी कमर अथवा कन्धों में हाथ डाले सभी पुरुषों के मन्द, सन्तुलित पद-संचालन से यह नृत्य गीत प्रारम्भ होता है । वृत के बीच में खड़ा हुड़का-वादक गीत की पहली पंक्ति को गाता हुआ नाचता है, जिसे सभी नर्तक दुहराते हैं, गीत गाते और नाचते हैं । झोडों में उत्सव या मेले से सम्बन्धित देवता विशेष की स्तुति भी नृत्यगीत भावनाएँ व्यंजित होती हैं । सामयिक झोड़ों में चारों ओर के जीवन-जगत पर प्रकाश डाला जाता है । 'झोडे' कई प्रकार के होते हैं । परन्तु मेलों में मुख्यत: प्रेम प्रधान झोडों की प्रमुखता रहती है ।

चाँचरी - चाँचरी अथवा चाँचुरी कुमाऊँ का समवेत नृत्यगीत है । इस नृत्य की विशेषता यह है कि इसमें वेश-भूषा की चमक-दमक अधिक रहती है । दर्शकों की आँखे नृतकों पर टिकी रहती है । 'चाँचरी' और झोड़ा नृत्य देखने में एक सा लगता है परन्तु दोनों की शैलियों में अन्तर है । चाँचरी में पद-संचालन धीरे-धीरे होता है । धुनों का खिंचाव दीर्ध होता है । गीतों के स्वरों का आरोह और अवरोह भी लम्बाई लिये होता है । नाचने में भी लचक अधिक होती है । 'चाँचरी' नृत्य गीतों की विषय-वस्तु भी झोड़ों की तरह धार्मिक, श्रंगार एवं प्रेम-परक भावों से ओत-प्रोत रहती है । दानपुर का 'चाँचरी' कुमाऊँ की धरती का आकर्षक नृत्य माना जाता है ।

छपेली - कुमाऊँ का सबसे अधिक चहेता नृत्य गीत छपेली नृत्य है । इस नृत्य में पुरुष हुड़का-वादक गाता हुआ नृत्य करता है और महिला नर्तकी गीतों के भावों के अनुकूल नाचती रहती है । दृश्य एवं श्रव्य गुणों का अद्भुत मेल छपेली नृत्य में दिखाई देता है । छपेली नृत्य में गीत और नृत्य में यौवन का उल्लास छलकता हुआ मिलता है ।

वास्तव में 'छपेली' प्रेमियों के नृत्यगीत हैं । इस नृत्य शैली में जोड़ा बनाकर नृत्य किया जाता है । प्रेमी तथा प्रेमिका के एक हाथ में रुमाल और दूसरे हाथ में दपंण रहता है ।

'छपेली' नृत्य में नृत्य की गति तीव्र होती है । यह प्रेमी-प्रेमिका के सन्दर्भ में रुढ़ हो गया है । 'छपेली' गीतों की एक पंक्ति टेक होती है जिसे गायक (नायक) दो पंक्तियों के अन्तर के बाद दोहराता है । यह स्थायी पंक्ति गीत विशेष की 'थीम' कही जा सकी है -

ओ हो न्योला न्योला न्योला मेरी सोबना,
दिन-दिन यो यौवन जाण लाग्यो

भगनौल - उक्तिपरक सौन्दर्य गीत 'भगनौल' कहे जाते हैं । इन गीचों के साथ प्राय: नृत्य नहीं होता परन्तु 'भगनौले' खड़े होकर किसी आलंबन को इंगित कर गाये जाते हैं या संकेत कर गाये जाते हैं । ऐसी भाव दशा में एक प्रकार का भाव प्रधान नृत्य होने लगता है ।

पुरुष गायक का साथी, जिसे 'होवार' कहते हैं, वह नायक के स्वरों को विस्तार देता है । संकेत या इंगित किये गये व्यक्ति की यदि वहाँ पर उपस्थिति रहती है तो वह भी प्रत्युत्तर में 'भगनौल' गाता है । एक प्रसिद्ध भगनौल इस प्रकार है -

जागेश्वर धुरा बुर्रूंशी फुलिगे
मैं के हूँ टिपुं फूला, मेरी हँसा रिसै रे ।

'भगनौल' में प्रयुक्त होने वाली उक्तियाँ गायकों की अपनी विरासत होती हैं । गायक की कुशलता इसी में देखी जाती है कि वह अपने द्वारा प्रयुक्त उक्तियों को किस प्रकार चुटीली पंक्तियों में जोड़ता है । उन पंक्तियों को जोड़ कहा जाता है । 'भगनौल' का पूर्व आकार या कोई निश्चित स्वरुप नहीं होता । यह गायक की अपनी विशिष्ट सूझ-बूझ, वाक्-चातुर्य और यादद्श्त पर निर्भर करता है कि वह कैसा चुटीला 'भगनौल' कह सकता है ।

७. परिसंवादात्सक गीत
संवाद प्रधान गीतों के अन्तर्गत वे सभी गीत आ जाते हैं जिनका विषय प्रश्नोत्तर होता है । प्राय: ऐसे गीत पुरुष और स्री के संवादों वाले होते हैं । ऐसे गीत स्री-पुरुषों के संयुक्त रुप में अथवा पृथक-पृथक भी गाये जाते हैं । स्री-पुरुषों में प्रेमी-प्रमिका, पति-पत्नी और जीजा-साली प्रमुख पात्र होते हैं । किसी-किसी गीत में भाई-बहन, माँ-बेटी, पिता-पुत्र अथवा दो मित्र भी परिसंवादात्मक गीतों के नायक एवं नायिकाएँ हो जाते हैं । ऐसे गीतों में अत्यन्त नाटकीयता होती है । कुमाऊँनी नृत्य-गीतों में इस प्रकार के नृत्य-गीतों को बड़े चाव से मंचन किया जाता है । दर्शक ऐसे नृत्य-गीतों को देखकर झूम उठते हैं ।

८. न्योली
ऐसे गीतों को वनों के गीत कहना उपयुक्त होगा । क्योंकि ऐसे जंगलों में प्राय: स्री-पुरुषों द्वारा गाये जाते हैं । ये 'न्योली' गीत प्रेम-परम गीत होते हैं । पुरुष गायक इन गीतों में 'न्योली' और स्री गायिका अपने गीत में 'न्योला' या 'न्योल्या' शब्द का सम्बोधन रुप में पुनरावृति करती है । प्रत्येक न्योली गीत में दो पंक्तियाँ होती हैं । पहली पंक्ति बहुधा किसी मानवीय अथवा प्रकृतिक वस्तु को दृष्टि में रखकर या उद्देश्य के रुप में रखकर कही जाती है ।

दूसरी पंक्ति कहने के बाद ही अर्थ स्पष्ट होता है और पहली पंक्ति का अर्थ भी स्पष्ट होता है । वास्तव में पहली पंक्ति का कोई अर्थ नहीं होता - वह तो 'पट' मिलाने के लिए प्रयुक्त की जाती है ।

बार बाजा नैनीताला, एक बाज्या थाणाँ में,
म्वाया जसी पाकी रै छै निं ऊँनी खाणा में ।

जब नैनीताल बाजार में बारह बजे, तो थाने में एक बजे का घण्टा बजाया गया ।

ओ प्रियं ! तुम पके अँगूर की तरह रसीली हो परन्तु हमारा ऐसा भाग्य कहाँ है कि हम तुम्हारे इस पके रस का रसास्वादन कर सकें ?

स्वर बदलकर जंगलों में घास काटते हुए ऐसे गीत गाये जाते हैं । पुरुष लकड़ी काटते हुए महिलाओं का उत्तर देते हैं । पिथौरागढ़ अंचल की न्योलियों में स्वर विस्तार और संगीतात्मकता अधिक रहती है । ऐसे गीतों के साथ वाद्य-यंत्रों का प्रयोग नहीं होता । केवल स्वरों के उतार-चढ़ाव से ही मधुर संगीत की सृष्टि होती है । 

९. बालगीत
कुमाऊँ में बालगीतों की संख्या अधिक नहीं है । 'लोरी' की शैली में गाये जाने वाले ऐसे गीत लय प्रधान होते हैं । कुछ तो नन्हें बालकों को सुलाने या बहलाने के लिए ऐसे गीत गाये जाते हैं और कुछ गीतों को स्वयं बच्चे गाकर खुशी मनाते हैं ।

बैर - 'बैर' या 'बैरो' तर्क प्रधान गीत होते हैं । गायक अपनी प्रत्युत्पन्न मति का परिचय इन गीतों में देता है। प्रश्नों का अद्भुत होना और प्रत्युत्तर का चुटीला और भाव प्रधान होना ही बैर गीत का मुख्य गुण है ।

दो गायकों के बीच गीत युद्ध होता है । एक गायक अपने प्रतिद्वन्दी गायक से प्रश्न करता है । उसके प्रत्युत्तर में दूसरा गायक तत्काल उसका उत्तर उसी ढंग से देता है । उदाहरण स्वरुप पहला गायक गीत में ही पूछता है कि तेरी पाँच बकरियों के दो ही बच्चे क्यों हुए ? प्रत्युत्तर में दूसरा गायक कहता है - अरे पता नही ? जनेऊ के दिन पाँच उंगलियों से पकड़ी दो फलक वाली कैंची से ही तो तुम्हारी हजामत बनी थी । व्यंग्य और कटाक्ष भी इन गीतों का विषय होता है ।

कुमाऊँ की भौगोलिक स्थितियों के भीतर 'बैर' गीतों का जन्म होता है । यहाँ का मानव जहाँ प्रकृति के साथ संघर्ष करता है, वहाँ वह, यहाँ की कठोर भूमि से भी संघर्ष करता है ।

युग-युगों से इस धरती का मानव इन्हीं पहाड़ों की नदी-घाटियों में परिश्रम करता रहा है । 'बैर' गीतों में इन सभी जीवन-लीलाओं की स्पष्ट प्रतिच्छाया दिखाई देती है । 'बैर' गीतों का गायन कठिन होता है । इसमें ओजपूर्ण कण्ठ और लम्बी साँस खींचकर गाने की शक्ति का होना आवश्यक है । 'कुमाऊँ' में 'बैर' गीतों के गायक 'बैरियों' का बड़ा सम्मान किया जाता है । विवाहोत्सव में वर एवं कन्या पक्ष के लोग 'बैरियों' को बुलाकर आपस में गीतमय प्रतिद्वेंद्विता करते हैं । विजयी रथ के 'बैरियों' को सम्मानित किया जाता है ।
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गद्य -पद्यात्मक काव्य

इस प्रकार के गीतों को कुछ विद्वान लोक-गाथाएँ कहकर अध्ययन करते है । वास्तव में ऐसे गीतों में अनेक स्थल ऐसे आते हैं जबकि गायक पद्य के अलावा गद्य का भी प्रयोग करता है । वह गद्य होता है परन्तु गायक उस गद्य को भी गेय बनाकर प्रस्तुत करता है ।

ऐसी गाथाओं में 'मालूशाही' का विशेष महत्व है । 'मालूशाही' कव्यूरी वंश के राजा 'मालू' तथा सुनपति शौका की पुत्री 'राजुली' की प्रेम-गाथा है । कुमाऊँ में यह प्रेम-गाथा सर्वत्र बड़े चाव से सुनी व गायी जाती है । इसकी कथा जोहार पिथौरागढ़, बारामण्डल, पाली-पछाऊँ और नैनीताल-भीमताल क्षेत्र में अलग-अलग रुपों में मिलती है परन्तु सब क्षेत्रों में मुख्य कथा एक जैसी है ।

कुमाऊँ में वीरगाथा काव्यों की अधिकता है । इन्हें कुमाऊँनी में 'भड़ौ' कहा जाता है । 'बफौल', 'सकराम कार्की', 'चन्द विखेपाल', 'दुला साही', 'भागद्यौ', 'नागी-भागीमल' और 'कुजीपाल' आदि अनेक गाथाएँ हैं जिन्हें भड़ौं के अन्तर्गत लिया जा सकता है ।

चन्द राजाओं में 'उदय चन्द', 'रतनी चन्द', 'विक्रम चन्द', 'भारती चन्द' और 'गुरु ज्ञानी चन्द' के भड़ौ कुमाऊँ में अधिक विख्यात हैं ।

पौराणिक कथाओं में भी 'भड़ौं' मिलते हैं । इनका प्रचार समस्त कुमाऊँ में कुछ परिवर्तनों के साथ मिलता है ।

स्फुट गीत - कुमाऊँ अंचल में 'भड़ों', 'जागरों' और अन्य प्रकार के गीतों के अतिरिक्त कुछ मुक्तक शैली के स्फुट गीत भी मिलते हैं । कहीं भी और कभी भी कोई घटना हो सकती है । इन्हीं घटनाओं पर लम्बे प्रबन्ध गीतों के अलावा छोटे गीत भी जन्म ले लेते हैं । स्फुट गीतों के कुछ नाम भी पड़ चुके हैं । ऐसे गीतों में 'धन्याली', 'गणतउ', 'टोसुक' और 'सोगुन' गिने जाते हैं । इसी परम्परा में राष्ट्र-प्रेम के गीत भी सम्मिलित किये जा सकते हैं । वैसे घटना विशेष के गीतों का कोई विशिष्ट वर्ग नहीं होता । जैसी घना होती है - वैसा ही उसका विषय भी बन जाता है ।

रमोला - कुमाऊँ में इन गाथा को विशेष आदर मिला है । इस गाथा में पौराणिक, ऐतिहासिक, सामाजिक और कलात्मक रुप एक साथ मिलता है । यह ऐसा सुन्दर बन पड़ा है कि 'लोक महाकाव्य' कहने में तनिक भी संकोच नहीं होता । यह ऐसा 'लोक महाकाव्य' है जिसमें प्रेमाख्यान, वीर-भावना, तांत्रिक चमत्कार, सिद्ध और नाथ-पंथी परम्पराओं का अत्यन्त कुशलता से समावेश किया गया है । इस गाथा की गायन शैली गीतात्मक है । इस शैली का इतना आकर्षण है कि सर्वत्र 'रमोला' लोककाव्य की मांग होती है। अभी कुछ महीने पहले रमेशचनद्र शाह और मोहन उप्रेती ने दूरदर्शन के लिए 'रमोला' लोक महाकाव्य की प्रस्तुति अत्यंत कलापूर्ण ढंग से की थी । 
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गद्य -काव्य

१. लोक-कथायें
कुमाऊँ में लोक-गाथाएँ और लोक-कथाएँ समान रुप से लोकप्रिय हैं । लोक गाथाओं में पद्य की अधिकता रहती है जबकि लोक-कथाएँ पूर्णत: गद्य में कही सुनी जाती है । कुमाऊँ में लोक-कथाओं का लम्बा सिलसिला है । 'भूत-प्रेतों', 'दैत्य-राक्षसों', 'पशु-पक्षी', 'पेड़-पौधों', 'व्रत-त्यौहारों' और 'हास्य-चुटकलों' आदि से सम्बन्धित अनेक कहानियाँ इस अंचल में मिलती हैं ।

२. लोकोक्तिया
कुमाऊँ में लोकोक्तियाँ और मुहावरों का बहुत बड़ा भण्डार है । इनमें कुमाऊँ के लोक-जीवन के विविध पहलुओं, आचार-विचार, रीति-रिवाज, सामाजिक परम्पराओं एवं जीवन दर्शन की स्पष्ट झलक मिल जाती है । कुमाऊँ में लोकोक्तियों के माध्यम से कई महत्वपूर्ण सन्देश तक पहुँचाये जाते हैं । वास्तव में कुमाऊँ का लोक-साहित्य अत्यन्त समृद्ध और रसीला साहित्य है । 
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शौका क्षेत्र के लोकगीत एवं नृत्य

कुमाऊँ का सीमान्त क्षेत्र ही शौका क्षेत्र है । इस क्षेत्र में दारमा, व्यांश और चौदांश अंचल आते हैं । यहाँ वे निवासी अस्थायी परिव्राजक का जीवन व्यतीत करते हैं । शौक समाज रंगीला समाज है । यहाँ का प्रत्येक व्यक्ति गीतकार और नृत्यकार होता है । यहाँ वृद्धो, युवकों, युवतियों एवं बच्चों की अपनी-अपनी गीत एवं नृत्यों की टोलियाँ होती हैं ।

इस समाज की मुख्य विशेषता यह है कि ये लोग हमेशा प्रसन्न रहते हैं । देवताओं की पूजा हो या भूत-प्रेतों का बलि, बच्चे का जन्म हो या परिवार के किसी व्यक्ति की मृत्यु का समाचार हो - ये लोग अपने गीतों के माध्यम से अपने मन की भावनाओं को व्यक्त करने में पीछे नहीं रहते ।

शौका क्षेत्र में निम्न प्रकार के गीत मिलते हैं - 
१. क्षीरा गीत - 'छीरा' गीत संस्कारों के मंगलगीत होते हैं । मंगलाचरण के रुप में इन गीतों का प्रयोग किसी मंगल कार्य के संस्कार को प्रारम्भ करने पर होता है ।

२. ऐतिहासिक गीत - व्यांस पट्टी में जहाँ व्यास की पूजा होती है, वहाँ ऐतिहासिक दृष्टि से व्यास की कथा को गीत रुप में गाया जाता है ।

३. बाज्यू गीत - इस क्षेत्र का यह चहेता गीत है । इन गीतों में वीरता, देवस्तुति और प्राकृतिक सुन्दरता का सुन्दर वर्णन होता है ।

४. प्रेमाख्यान - शौका क्षेत्र में सबसे अधिक प्रेम प्रधान गीत मिलते हैं । प्रेम गीतों का गायन यत्र-तत्र होता है । युवक तथा युवतियाँ ऐसे गीतों का प्रयोग रंगबंग में भी करते हैं । 

पत्र के माध्यम से यहाँ के प्रेम-गीतों का आरम्भ होता है ।

सामुहिक गीत - शौका क्षेत्र का कुमाऊँ के चाँचरी जैसा गीत नृत्य है । प्रश्नोत्तर के रुप में यह गीत नृत्य चलता रहता है । दो पक्षों में गाने वालों के दल बँट जाते हैं । दोनों पक्षों के एक या दो गायक नेता होते हैं । एक नेता गीत गाकर प्रश्न करता है । सभी नर्तक उस प्रश्न रुपी गीत को दो या चार बार दुहराते हैं। इसी तरह दूसरी टोली का नायक पहले नायक का उत्तर गीतों में ही देता है । उसके उत्तर को भी उसके दल के नर्तक दो या चार बार दुहराकर नाचते जाते हैं । जब कोई नेता गायक थक जाता है या प्रत्युत्तर देने की स्थिति में नहीं रहता तो वह अपने साथियों में से किसी को नेता चुन लेता है । नेता चुनकर वह अपनी ओर से नये नेता का परिचय देता है और कहता है कि अब फलाँ गायक नेता तुमसे प्रतिस्पर्धा करेगा। इसी तरह यह गीत नृत्य निरंतर चलता रहता है । युवतियों में भी अपने दल होते हैं - वे भी ऐसे गीतों का गाकर और नाच-नाचकर समा बाँध लेती हैं ।

इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में 'कृषि-गीत', 'देव-स्तुतिके गीत', 'बाल-गीत', 'समस्या प्रधान गीत', 'घटना प्रधान गीत' और 'जागृति के गीत' भी अधिक सँख्या में मिलते हैं ।

दूरिड़ अथवा अम्हरम् - यह अन्व्येष्टि का गीत है । कुमाऊँ में ही क्या अन्य क्षेत्रों के लोक-गीतों में भी अन्व्येष्टि का गीत नहीं मिलता, परन्तुशौका क्षेत्र में दूरिड़ (अम्हरम) एक ऐसी गीत शैली है जिसमें वहाँ के मानव की आत्मा छटपटाती हुई मिलती है ।

शौका क्षेत्र के नृत्य - शौका क्षेत्र का नृत्य अत्यन्त आकर्षक होते हैं । यहाँ का प्रत्येक प्राणी नृत्य-पटु होता है । यहाँ के नृत्यों में हुड़का, मुरली और बाँसुरी का प्रयोग होता है । महिलाऐं, 'बिणई' बजाकर गीत गाती हैं और नाचती हैं ।

छोलिया नृत्य - इस अंचल का सबसे अधिक चहेता नृत्य 'छौलिया' है । इस नृत्य में वीरता की झलक स्पष्ट दिखाई देती है । विशेष नृत्य की पौशाक में जब नर्तक वीरता की कलाबाजियाँ ढाल-तलवार के साथ दिखाते हैं तो यह नृत्य दर्शकों को अपने आप में पूर्णत: बाँध लेता है । १९७० में गणतन्त्र दिवस के अवसर पर शौका लोगों का यही 'छोलिया नृत्य' नयी दिल्ली के सभी क्षेत्रों में चर्चा का विषय बना था ।

डंडयाला नृत्य - यह स्री पुरुषों का चहेता नृत्य गीत है । स्री-पुरुष अपने दोनों हाथों में दो डण्डे लेकर गोल घेरे में आगे-पीछे मुँहकर, डण्डों का आपस में टकराते हुए नृत्य करते हैं । गुजरात के 'गरबा' नृत्य की तरह यह नृत्य भी अत्यन्त आकर्षक नृत्य है ।

चम्फूली नृत्य - यह नृत्य भी गोल घेरे में कभी हाथ पकड़कर किया जाता है तो कभी घूमकर, ताली बजा-बजाकर एक-दूसरे की तरफ मुड़कर नाचते हुए सम्पन्न किया जाता है । इसमें धीमी गति होती है और गीत की अजीब ठसक होती है ।

धुस्का नृत्य - यह इस क्षेत्र का विशिष्ट और विविधता का नृत्य है । इस नृत्य की विविध शैलियाँ हैं । कभी एक पुरुष और एक स्री ही नृत्य करती है, कभी स्री-पुरुषों का एक गोल घेरा बन जाता है । एक नर्तक बगल वाले दूसरे नर्तक या नर्तकी के कमर में हाथ डालकर या कभी एक-दूसरे का हाथ पकड़कर नृत्य करते हैं । पुरुष दल यदि सीधा खड़ा रहेगा तो महिला दल झुककर एक कदम आगे और एक कदम पीछे चलकर नृत्य करता है । साथ में गीत भी गाया जाता है । गीत खड़ी होने वाली पार्टी गाती है । झुककर चलने वाली पार्टी गीत को दुहराती जाती है ।


शौका क्षेत्र गस्ती का क्षेत्र है । यहाँ का जन-जीवन भेड़-बकरियों के साथ अधिक व्यतीत होता है । इनके गीतों में अपने व्यक्ति के लिए जितनी चिन्ता रहती है उससे भी अधिक इन्हें अपने भेड़ो और बकरियों की याद रहती है । इसलिए शौका क्षेत्र के गीतों और नृत्यों में इन पशुओं के लिए भी पर्याप्त स्थान रहता
है । यहाँ के कई घटना-प्रधान गीतों में भेड़ों का जिक्र रहता है तो कई नृत्यों में भेड़ तथा बकरियों को नायक या नायिका के रुप में प्रस्तुत किया जाता है ।

कुमाऊँ के मेलों एवं उत्सवों में ऐसे सभी नृत्यों का आयोजन होता है जिन्हें वहाँ के मानव में अपने जीवन दर्शन में पूर्णत: स्थान दे दिया है ।


कुमाऊँ के मनुष्यों के गुण, स्वभाव व कर्म

जबकि नगर के लोग चतुर, चालाक व चंचल प्रकृति के होते हैं, देहात के लोग ज्यादातर सीधे-सादे व सरल स्वभाव के पाये जाते हैं । पर कुमाऊँ की साधारण जनता सामान्य शिक्षित होने पर भी काफी समझदार है । अल्मोड़ा नगर के लोग तो सब प्रकार धनवान, विद्धान, गुणवान व सम्पतिवान हैं, पर उनमें 'स्व' की मात्रा ज्यादा होती है । यदि ऐसा न होता, तो संसार भर के लोगों में वे किसी बात में कम न होते । इसका कारण यह है कि साधारण कुमय्यों का उद्देश्य आज तक अनपढ़ों की खेती, स्वल्प पढ़ों का क्षुद्र चाकरी तथा ज्यादा पढ़ों का नौकरी रहा है । वाणिज्य, व्यवसाय तथा कला-कौशल से ही प्रत्येक जाति उत्पन्न होती है । यहाँ पर लेखक, कवि, राजनीतिज्ञ तथा कुछ राजभक्त कर्मचारी व साधारण व्यापारी हुए हैं जिनका नाम तमाम भारतवर्ष में प्रचलित है । वे भारत के प्राय: अनेक प्रांतों में, पर विशेषत: संयुक्त प्रांत में अच्छे-अच्छे सरकारी पदों को सम्मानपूर्वक सुशोभित करतो हैं ।

देश-सेवा में कुमाऊँ का नाम उज्जवल करने वाले राष्ट्रीय नेता पे. गोविंदवल्लभ पंत हैं । वे अपनी विद्वता, त्याग, तपस्या व देश-सेवा के कारण राजनीतिक क्षेत्र में अखिल भारतवर्षीय ख्याति पाई है । चिकित्सा में स्वनाम धन्य डॉ. नीलाम्बर चिन्तामणि जोशीजी ने कुर्माचलियों का नाम तमाम भारत में प्रख्यात किया है । हिन्दी जगत् में नाम कमाने वाले डॉ. हेमचन्द्र जोशी तथा कविवर सुमित्रानंदन पंत हैं । उधर डॉ. लक्ष्मीदत्त जोशीजी ने उच्च कानूनी शिक्षा प्राप्त कर कुमाऊँ का मान बढ़ाया है ।

मृतक-कर्म की रीतियाँ

वृद्धावस्था प्राप्त हो जाने पर पुत्रवान कुटुम्बी, आस्तिक धनी काशीवास कर लेते थे, अथवा अन्यत्र कहीं गंगा-तट पर निवास करके ईश्वर-भजन करते थै । पर अब लोग पुत्रादि के समीप रहना आवश्यक समझते हैं । मृत्यु के समय गीता और श्रीमद्भागवतादि का पाठ सुनना, रामनाम का जप करना स्वर्गदायक समझा जाता है । गोदान और दश-दान कराके, होश रहते-रहते मृतक को चारपाई से उठाकर जमीन में लिटा दिया जाता है । प्राण रहते गंगा जल ड़ाला जाता है । प्राण निकल जाने पर मुख-नेत्र-छिद्रादि में सुवर्ण के कण ड़ाले जाते हैं । फिर स्नान कराकर चंदन व यज्ञोपवीत पहनाये जाते हैं । शहर व गाँव के मित्र, बांधव तथा पड़ोसी उसे श्मशान ले जाने के लिए मृतक के घर पर एकत्र होते हैं । मृतक के ज्येष्ठ पुत्र, उसके अभाव में कनिष्ठ पुत्र, भाई-भतीजे या बांधव को मृतक का दाह तथा अन्य संस्कार करने पड़ते हैं । जौ के आटे से पिंडदान करना होता है । नूतन वस्र के गिलाफ (खोल) में प्रेत को रखते हैं, तब रथी में वस्र बिछाकर उस प्रेस को रख ऊपर से शाल, दुशाले या अन्य वस्र ड़ाले जाते हैं । मार्ग में पुन: पिंड़दान होता है । घाट पर पहुँचकर प्रेत को स्नान कराकर चिता में रखते हैं । श्मशान-घाट ज्यादातर दो नदियों के संगम पर होते हैं । पुत्रादि कर्मकर्ता अग्नि देते हैं । कपाल-क्रिया करके उसी समय भ कर देते हैं । देश की तरह तीसरे दिन चिता नहीं बुझाते । उसी दिन बुझाकर जल से शुद्ध कर देते हैं । कपूतविशेष (कपोत यानि कबूतक के तुल्य सिर पर बाँधना होता है । इस 'छोपा' कहते हैं । मुर्दा फूँकनेवाले सब लोगों को स्नान करना पड़ता है । पहले कपड़े भी धोते थे । अब शहर में कपड़े कोई नहीं धोता । हाँ, देहातों में कोई धोते हैं । गोसूत्र के छींटे देकर सबकी शुद्धि होती है । देहात में बारहवें दिन मुर्दा फूँकनेवालों का 'कठोतार' के नाम से भोजन कराया जाता या सीधा दिया जाता है । नगर में उसी समय मिठाई, चाय या फल खिला देते हैं । कर्मकर्ता को आगे करके घर को लौटते हैं । मार्ग में एक काँटेदार शाखा को पत्थर से दबाकर सब लोग उस पर पैर रखते हैं । श्मशान से लौटकर अग्नि छूते हैं, खटाई खाते हैं ।

कर्मकर्ता को एक बार हविष्यान्न भोजन करके ब्रह्मणचर्य-पूर्वक रहना पड़ता है । पहले, तीसरे, पाँचवे, सातवें या नवें दिन से दस दिन तक प्रेत को अंजलि दी जाती है, तथा श्राद्ध होता है ।

मकान के एक कमरे में लीप-पोतकर गोबर की बाढ़ लगाकर दीपक जला देते हैं । कर्मकर्ता को उसमें रहना होता है । वह किसी को छू नहीं सकता । जलाशाय के समीप नित्य स्नान करके तिलाञ्जलि के बाद पिंडदान करके छिद्रयुक्त मिट्टी की हाँड़ी को पेड़ में बाँध देते हैं, उसमें जल व दूध मिलाकर एक दंतधावन (दतौन) रख दिया जाता है और एक मंत्र पढ़ा जाता है, जिसका आशय इस प्रकार है - "शंख-चक्र गदा-धारी नारायण प्रेतके मेक्ष देवें । आकाश में वायुभूत निराश्रय जो प्रेत है, यह जल मिश्रित दूध उसे प्राप्त होवे । चिता की अग्नि से भ किया हुआ, बांधवों से परिव्यक्त जो प्रेत है, उसे सुख-शान्ति मिले, प्रेतत्व से मुक्त होकर वह उत्तम लोक प्राप्त करे ।" सात पुश्तके भीतर के बांधव-वर्गों को क्षौर और मुंडन करके अञ्जलि देनी होती है । जिनके माता-पिता होते हैं, वे बांधव मुंडन नहीं करते, हजामत बनवाते हैं । दसवें दिन कुटुम्बी बांधव सबको घर की लीपा-पोती व शुद्धि करके सब वस्र धोने तथा बिस्तर सुखाने पड़ते हैं । तब घाट में स्नान व अञ्जलिदान करने जाना पड़ता है । १० वें दिन प्रेत कर्म करने वाला हाँड़ी को फोड़ दंड व चूल्हे को भी तोड़ देता है, तथा दीपक को जलाशय में रख देता है । इस प्रकार दस दिन का क्रिया-कर्म पूर्ण होता है । कुछ लोग दस दिन तक नित्य दिन में गरुड़पुराण सुनते हैं ।

ग्यारहवें दिन का कर्म एकादशाह तथा बारहवें दिन का द्वादशाह कर्म कहलाता है । ग्यारहवें दिन दूसरे घाट में जाकर स्नान करके मृतशय्या पुन: नूतन शय्यादान की विधि पूर्ण करके वृषोत्सर्ग होता है, यानि एक बैल के चूतड़ को दाग देते हैं । बैल न हुआ, तो आटे गा बैल बनाते हैं । ३६५ दिन जलाये जाते हैं । ३६५ घड़े पानी से भरकर रखे जाते हैं । पश्चात् मासिक श्राद्ध तथा आद्य श्राद्ध का विधान है ।

द्वादशाह के दिन स्नान करके सपिंडी श्राद्ध किया जाता है । इससे प्रेत-मंडल से प्रेत का हटकर पितृमंडल में पितृगणों के साथ मिलकर प्रेत का बसु-स्वरुप होना माना जाता है । इसके न होने से प्रेत का निकृष्ट योनि से जीव नहीं छूट सकता, ऐसा विश्वास बहुसंख्यक हिन्दुओं का है । इसके बाद पीपल-वृक्ष की पूजा, वहाँ जल चढ़ाना, फिर हवन, गोदान या तिल पात्र-दान करना होता है । इसके अनन्तर शुक शान्ति तेरहवीं का कर्म ब्रह्मभोजनादि इसी दिन कुमाऊँ में करते हैं । देश में यह तेरहवीं को होता है ।

श्राद्ध - प्रतिमास मृत्यु-तिथि पर मृतक का मासिक श्राद्ध किया जाता है । शुभ कर्म करने के पूर्व मासिक श्राद्ध एकदम कर दिए जाते हैं, जिन्हें "मासिक चुकाना" कहते हैं । साल भर तक ब्रह्मचर्य पूर्वक-स्वयंपाकी रहकर वार्षिक नियम मृतक के पुत्र को करने होते हैं । बहुत सी चीजों को न खाने व न बरतने का आदेश है । साल भर में जो पहला श्राद्ध होता है, उसे 'वर्षा' कहते हैं ।

प्रतिवर्ष मृत्यु-तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध किया जाता है । आश्विन कृष्ण पक्ष में प्रतिवर्ष पार्वण श्राद्ध किया जाता है । काशी, प्रयाग, हरिद्वार आदि तीर्थों में तीर्थ-श्राद्ध किया जाता है । तथा गयाधाम में गया-श्राद्ध करने की विधि है । गया में मृतक-श्राद्ध करने के बाद श्राद्ध न भी करे, तो कोई हर्ज नहीं माना जाता । प्रत्येक संस्कार तथा शुभ कर्मों में आभ्युदयिक "नान्दी श्राद्ध" करना होता है । देव-पूजन के साथ पितृ-पूजन भी होना चाहिए । कर्मेष्ठी लोग नित्य तपंण, कोई-कोई नित्य श्राद्ध भी करते हैं । हर अमावस्या को भी तपंण करने की रीति है । घर का बड़ा ही प्राय: इन कामों को करता है ।

शिल्पकार हरिजन जो सनातनधर्मी हैं, वे अमंत्रक क्रिया-कर्म तथा मुंडन करते हैं, और श्राद्ध ज्यादातर आश्विन कृष्ण अमावस्या को करते है । जमाई या भांजे ही उनके पुरोहित होते हैं ।

संस्कार तथा उत्सव

जातकर्म, नामकरण, व्रतवंध, विवाहादि संस्कार कहलाते हैं । और षष्ठी महोत्सव, जन्मोत्सव, अक्षरारंभ आदि कर्म उत्सव होते हैं । इन कर्मों के करने की विधि दशकर्म-पद्धति में है । कूर्माचल में कट्टरता ज्यादा है । इससे ये बातें बहुतायत से मानी जाती हैं । १६ संस्कारों के नाम ये हैं - 

१. गर्भाधान
२. पुंसवन
३. सामन्तोनयन
४. जातकर्म
५. नामकर्म
६. निष्कृमण
७. अन्नप्राशन
८. चूड़ाकर्म
९. उपनयन
१०. वेदारंभ
११. समावर्तन
१२. विवाह
१३. अग्न्याधान
१४. दीक्षा
१५. महाव्रत
१६. सन्यास


१. गर्भाधान संस्कार
सन्तान प्राप्ति के निमित्त रजोदर्शन के पश्चात् देवपूजन कर तथा समय निर्धारित कर सहवास किया जाता था । अब यह संस्कार प्राय: नहीं होता । अब प्रथम रजोदर्शन के बाद जो गणेश-पूजन होता है, वही शायद इसका रुपान्तर है ।

२. पुंसवन / ३. सीमन्तोनयन 
गर्भधारण के तीसरे महीने लगभग पुंसवन तथा आठवें महीने सीमन्तोनयन करने की विधि पहले होगी किनतु अब ये संस्कार नहीं होते ।

४. जातकर्म
नवजात शिशु के उत्पन्न होने पर सचैल स्नान कर कुछ पूजन की विधि थी, पर अब यह प्रथा भी प्राय: उठ गयी है ।

५. षष्ठी महोत्सव
बालक के जन्मदिन के छठे दिन रात्रि के समय यह उत्सव मनाया जाता है । षष्ठीपूजन, राहुबेधन नामक कर्म किये जाते हैं । पर ज्यादातर पुत्र की छठ होती है । पुत्री की छठ बिरले धनी पुरुष करते हैं । यह कोई संस्कार नहीं, केवल उत्सव है । गीत-वाद्य, मंगल-गान, मंत्र-पाठ, तिलक करके ब्राह्मण तथा इष्ट-मित्र, बंधु-बाँधवों के दावत दी जाती है । बड़ी धूम-धाम से यह उत्सव कुमाऊँ में मनाया जाता है ।

६. नामकर्म या नामकरण
संतान उत्पन्न होने के ११वें दिन बालक का नाम रखा जाता है । सूतिकागृह को गोमूत्र व पंचगण्य से प्रात: स्नान के अनन्तर शुद्ध किया जाता है । पश्चात् हवन व अन्य कर्मों से सूतिका की अस्पृश्यता दूर की जाती है । नक्षत्रानुसार नाम स्थिर करके एक वस्र में लिखकर प्रतिष्ठा उस वस्र से वेष्ठित शंख से बालक के कान में पिता नाम का उच्चारण करता है । सूर्यावलोकन भी आज ही होता है । ब्राह्मणों और बान्धवादिकों को भोज कराके तिलक भेंट देकर नामकर्म का विधान पर्ण होता है । 

७. अन्नप्राशन
यह संस्कार पुत्र का छठे या आठवे, महीने, कन्या का पाँचवे अथवा सातवें महीने शुभ लग्न और अनुकूल सुहूर्त में किया जाता है । वस्र, शस्र, पुस्तक, लेखनी, सुवर्ण रौत्यादि अनेक वस्तुऐं बालक के सामने रखी जाती है । जिस वस्तु को बालक छू ले, उसी वस्तु से उसको भविष्य में लाभ होने की संभावना होती हैं । जैसे पुस्तक के स्पर्श से विद्याजीवी पंडित होना, लेखनी से लेखक, शस्र स्पर्श से सैनिक, सुवर्ण से धनी व्यापारी आदि ।

८. जन्मोत्सव
यह जन्मवार भी कहा जाता है । यह जन्म-तिथि को प्रतिवर्ष मनाया जाता है । विशेषकर पुत्रों का उत्सव होता है, पुत्रियों का बहुत कम । ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, गणेश के अलावा मार्कण्डेय, बलि, व्यास, परशुराम, अश्वव्थामा, प्रहलाद, हनुमान, विभीषण आदि की पूजा की जाती है । स्रियों में गीत-वाद्यादि प्रात:काल तथा सायंकाल दोनों वक्त होते हैं । 'पुवे' (गुलगुले) भी पकाये जाते हैं । इष्ट-मित्र, अड़ोसी-पड़ोसी को भी भोजन कराया जाता है । 

९. कणवेध
तीसरे या पाँचव वर्ष में कान छेदने का भी विधान है, पर कुमाऊँ में अब कोई-कोई करते हैं । ज्यादातर उपनयन-संस्कार के दिन कान छेदे जाते हैं ।

१०. चूड़ाकरण
इसका मुख्य काल तीसरा वर्ष है, पर यहाँ पर ज्यादातर चूड़ाकरण व्रतबंध के साथ करते हैं । बड़े-बड़े बाल उपनयन तक रखे जाते हैं, जिनमें बहुत सा मैल जम जाता है ।

११. अक्षराम्भ
बालक की पाँच वर्ष की अवस्था प्रारंभ होने पर शुभ मुहुर्त देखकर अक्षरारंभ-कर्म होता है । पहले पूजन वगैरह होता है । अब ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है ।

१२. उपनयन संस्कार
इसे व्रतबंध तथा जनेऊ-संस्कार भी कहते हैं । बालक इसी दिन से द्विज कहलाता है । व्रत ग्रहण करने तथा व्रत से बंध होने के कारण यह संस्कार व्रतबंध कहा जाता है । गुरु के समीप उपनीत होने से उपनयन संस्कार कहा जाता है । चुटिया, जनेऊ धारण करने तथा संध्या करने का अधिकारी इसी दिन से प्रत्येक बालक होता है । विद्यारंभ व वेदारंभ का यह समझा जाता है । 
कुमाऊँ में यह संस्कार बड़े आडम्बर से दो दिन होता है । पहले दिन ग्रहयाग, दूसरे दिन उपनयन अनेकानेक कर्म किये जाते हैं । ८ से २५ वर्ष को कर्म दो दिन में किये जाते हैं । बहुत धन इस काम में खर्च होता है । कहीं-कहीं 'गोठ' में, मकान के निचले खंड में, कहीं यज्ञशाला में यह संस्कार किया जाता है । इसी दिन गुरु-दीक्षा भी दी जाती है । दो-चार वेद-मंत्र पढ़ाये जाते हैं । काशी पढ़ने को भेजा जाता है, फिर लौटा लिया जाता है । प्राचीन पद्धति की एक नकलमात्र की जाती है ।

१३. विवाह-संस्कार
ज्योतिष के अनुसार जन्म-कुन्डली मिलाकर तथा लग्न ठहराकर विवाह होते हैं । माता-पिता विवाह करते हैं । अपने वर्ण तथा भिन्न गोत्र-कुल की कन्या से विवाह होता है । मातृकुल में, असपिंड पितृकुल में, असगोत्र कन्या से विवाह होता है । विवाहोक्त महीनों और शुक्र तथा गुरु के उदय में उत्तम मुहूर्त देखकर ज्योतिषशास्र पंडित विवाह का लग्न स्थिर करता है । कुछ दिन पूर्व गणपति-पूजन करके तिल और गुड़ मिश्रित तथा चावल की पिट्ठी के लड्डू (लाड़ू), महालड्डू (समाधिये) एवं सुआले (एक प्रकार की सुखाई हुई पूरी) बनाये जाते हैं । 
विवाह के दिन वर तथा कन्या-पक्ष में पूजनादि होता है । कन्या के माता-पिता व्रती रहते हैं । प्रात: सायंकाल के समय बरात चढ़ती है । कभी-कभी सुबह भी आती है । ब्राह्मणों तथा वैश्यों में ध्वजा (निशान) बरात में नहीं जाते । क्षत्रियों में जाते हैं । दरवाजे में बाग्दान के संकल्प के बाद वर पक्ष को जनवासे में ठहराया जाता है । वर को कच्चा (दाल, चावल आदि) तथा बरातियों को पक्का भोजन कराया जाता है ।

पुन: विवाह का मुहूर्त जब आता है । वर, आचार्यादि वर-पक्षी तथा कन्या-पक्षी विवाहशाला में अंतपंट (पर्दा) डालकर बैठते हैं । स्रियाँ मांगलिक गीत गाती हैं । शाखोच्चारादि के पश्चात् कन्यादान संकल्प होता है , और देवता तथा ब्राह्मणों से आशीर्वाद लेकर विवाह-संबंध स्थिर होता है । तत्पश्चात् शय्यादान के पश्चात् सप्तपदी मांगलिक हवन लाजा होम होता है । छोटी-मोटी पूजाऐं और भी होती है । विवाह की विधि पूरी करके प्रात:काल जलपान, भोजनादि करके, वर-वधु और बरातियों को तिलक करके बिदा कर दिया जाता है । वर-पक्ष के लोग बरातियों को दावत देकर तथा तिलक लगाकर बिदा करते हैं । चतुर्थ-रात्रि में होता है । पुन:१६ दिन के भीतर अथवा विषम वर्षों में द्विरागमन की रीति की जाती है ।

साधारणत: विवाह इसी प्रकार होता है । किंतु इनके अलावा अन्य वर्गों में और भी दस्तुर हैं, जिनका सूक्ष्म विवरण अन्यत्र जातिखंड में आवेगा । 
१४. अग्न्याधान
सव्तनीक सायं-प्रात: औतोग्नि या स्मार्ताग्नि में हवन करने की विधि है । यह संस्कार लुप्त हो चुका है । कुमाऊँ में एक कुटुम्ब अग्निहोत्री त्रिपाठियों का अल्मोड़ा में चंद-राज्य के समय से ऐसा करता आया है । यह अभी विद्यमान है । 

१५. दीक्षा
वैदिक मंत्रों की दीक्षा लेकर वेद के उपासना कांड में शास्रीय विधि से प्रवृत करने का यह प्राचीन संक्कार है । पर अब यह विलुप्त हो चुका है । कुछ इने गिने लोग सूर्यग्रहनादि में किसी योग्य पंडित से मंत्र-दीक्षा लेकर गुरु बनाते हैं । स्रियाँ जप करती हैं । यही इस संस्कार का कपोता विशेष है । 

१६. महाव्रत
गृहस्थाश्रम को त्यागकर निवृत्ति-मार्ग में प्रवृत हो वानप्रस्थाश्रम में प्रवृष्ट होने का प्राचीन नियम था । इस संस्कार को भी बिरले ही करते हैं ।

१७. सन्यास
वानप्रस्थाश्रम के पश्चात् विधि-पूर्वक संस्कार द्वारा गुरु-दीक्षा लेकर 'कुटीचर, हंस, परमहंस' की पूर्ण पदवी प्राप्त करने का नियम था । संसार की सब माया-मोह रुपी वासना छोड़कर केवल भगवान की सेवा में सारा समय व्यतीत करने का नियम था । पर इसको भी अब इने-गिने लोग करते है । वैसे जोगी-साधु बहुत बनते हैं, पर सब मतलब के साधु-सन्यासी हैं । संसार-त्यागी व लोकोपकारी साधु कम देखने में आते हैं । 

नंदादेवी मेला-अल्मोड़ा

समूचे पर्वतीय क्षेत्र में हिमालय की पुत्री नंदा का बड़ा सम्मान है । उत्तराखंड में भी नंदादेवी के अनेकानेक मंदिर हैं । यहाँ की अनेक नदियाँ, पर्वत श्रंखलायें, पहाड़ और नगर नंदा के नाम पर है । नंदादेवी, नंदाकोट, नंदाभनार, नंदाघूँघट, नंदाघुँटी, नंदाकिनी और नंदप्रयाग जैसे अनेक पर्वत चोटियाँ, नदियाँ तथा स्थल नंदा को प्राप्त धार्मिक महत्व को दर्शाते हैं । नंदा के सम्मान में कुमाऊँ और गढ़वाल में अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं । भारत के सर्वोच्य शिखरों में भी नंदादेवी की शिखर श्रंखला अग्रणीय है लेकिन कुमाऊँ और गढ़वाल वासियों के लिए नंदादेवी शिखर केवल पहाड़ न होकर एक जीवन्त रिश्ता है । इस पर्वत की वासी देवी नंदा को क्षेत्र के लोग बहिन-बेटी मानते आये हैं । शायद ही किसी पहाड़ से किसी देश के वासियों का इतना जीवन्त रिश्ता हो जितना नंदादेवी से इस क्षेत्र के लोगों का है ।

कुमाऊँ मंड़ल के अतिरिक्त भी नंदादेवी समूचे गढ़वाल और हिमालय के अन्य भागों में जन सामान्य की लोकप्रिय देवी हैं । नंदा की उपासना प्राचीन काल से ही किये जाने के प्रमाण धार्मिक ग्रंथों, उपनिषद और पुराणों में मिलते हैं । रुप मंडन में पार्वती को गौरी के छ: रुपों में एक बताया गया है । भगवती की ६ अंगभूता देवियों में नंदा भी एक है । नंदा को नवदुर्गाओं में से भी एक बताया गया है । भविष्य पुराण में जिन दुर्गाओं का उल्लेख है उनमें महालक्ष्मी, नंदा, क्षेमकरी, शिवदूती, महाटूँडा, भ्रामरी, चंद्रमंडला, रेवती और हरसिद्धी हैं । शिवपुराण में वर्णित नंदा तीर्थ वास्तव में कूर्माचल ही है । शक्ति के रुप में नंदा ही सारे हिमालय में पूजित हैं ।

नंदा के इस शक्ति रुप की पूजा गढ़वाल में करुली, कसोली, नरोना, हिंडोली, तल्ली दसोली, सिमली, तल्ली धूरी, नौटी, चांदपुर, गैड़लोहवा आदि स्थानों में होती है । गढ़वाल में राज जात यात्रा का आयोजन भी नंदा के सम्मान में होता है ।
कुमाऊँ में अल्मोड़ा, रणचूला, डंगोली, बदियाकोट, सोराग, कर्मी, पौथी, चिल्ठा, सरमूल आदि में नंदा के मंदिर हैं ।अनेक स्थानों पर नंदा के सम्मान में मेलों के रुप में समारोह आयोजित होते हैं । नंदाष्टमी को कोट की माई का मेला और नैतीताल में नंदादेवी मेला अपनी सम्पन्न लोक विरासत के कारण कुछ अलग ही छटा लिये होते हैं परन्तु अल्मोड़ा नगर के मध्य में स्थित ऐतिहासिकता नंदादेवी मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को लगने वाले मेले की रौनक ही कुछ अलग है ।

अल्मोड़ा में नंदादेवी के मेले का इतिहास यद्यपि अधिक ज्ञात नहीं है तथापि माना जाता है कि राजा बाज बहादुर चंद (सन् १६३८-७८) ही नंदा की प्रतिमा को गढ़वाल से उठाकर अल्मोड़ा लाये थे । इस विग्रह को वर्तमान में कचहरी स्थित मल्ला महल में स्थापित किया गया । बाद में कुमाऊँ के तत्कालीन कमिश्नर ट्रेल ने नंदा की प्रतिमा को वर्तमान से दीप चंदेश्वर मंदिर में स्थापित करवाया था ।

अल्मोड़ा शहर सोलहवीं शती के छटे दशक के आसपास चंद राजाओं की राजधानी के रुप में विकसित किया गया था । यह मेला चंद वंश की राज परम्पराओं से सम्बन्ध रखता है तथा लोक जगत के विविध पक्षों से जुड़ने में भी हिस्सेदारी करता है ।

पंचमी तिथि से प्रारम्भ मेले के अवसर पर दो भव्य देवी प्रतिमायें बनायी जाती हैं । पंचमी की रात्रि से ही जागर भी प्रारंभ होती है । यह प्रतिमायें कदली स्तम्भ से निर्मित की जाती हैं । नंदा की प्रतिमा का स्वरुप उत्तराखंड की सबसे ऊँची चोटी नंदादेवी के सद्वश बनाया जाता है । स्कंद पुराण के मानस खंड में बताया गया है कि नंदा पर्वत के शीर्ष पर नंदादेवी का वास है । कुछ लोग यह भी मानते हैं कि नंदादेवी प्रतिमाओं का निर्माण कहीं न कहीं तंत्र जैसी जटिल प्रक्रियाओं से सम्बन्ध रखता है । भगवती नंदा की पूजा तारा शक्ति के रुप में षोडशोपचार, पूजन, यज्ञ और बलिदान से की जाती है । सम्भवत: यह मातृ-शक्ति के प्रति आभार प्रदर्शन है जिसकी कृपा से राजा बाज बहादुर चंद को युद्ध में विजयी होने का गौरव प्राप्त हुआ । षष्ठी के दिन गोधूली बेला में केले के पोड़ों का चयन विशिष्ट प्रक्रिया और विधि-विधान के साथ किया जाता है ।

षष्ठी के दिन पुजारी गोधूली के समय चन्दन, अक्षत, पूजन का सामान तथा लाल एवं श्वेत वस्र लेकर केले के झुरमुटों के पास जाता है । धूप-दीप जलाकर पूजन के बाद अक्षत मुट्ठी में लेकर कदली स्तम्भ की और फेंके जाते हैं । जो स्तम्भ पहले हिलता है उससे नन्दा बनायी जाती है । जो दूसरा हिलता है उससे सुनन्दा तथा तीसरे से देवी शक्तियों के हाथ पैर बनाये जाते हैं । कुछ विद्धान मानते हैं कि युगल नन्दा प्रतिमायें नील सरस्वती एवं अनिरुद्ध सरस्वती की हैं । पूजन के अवसर पर नन्दा का आह्मवान 'महिषासुर मर्दिनी' के रुप में किया जाता है । सप्तमी के दिन झुंड से स्तम्भों को काटकर लाया जाता है । इसी दिन कदली स्तम्भों की पहले चंदवंशीय कुँवर या उनके प्रतिनिधि पूजन करते है । उसके बाद मंदिर के अन्दर प्रतिमाओं का निर्माण होता है । प्रतिमा निर्माण मध्य रात्रि से पूर्व तक पूरा हो जाता है । मध्य रात्रि में इन प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा व तत्सम्बन्धी पूजा सम्पन्न होती है ।

मुख्य मेला अष्टमी को प्रारंभ होता है । इस दिन ब्रह्ममुहूर्त से ही मांगलिक परिधानों में सजी संवरी महिलायें भगवती पूजन के लिए मंदिर में आना प्रारंभ कर देती हैं । दिन भर भगवती पूजन और बलिदान चलते रहते हैं । अष्टमी की रात्रि को परम्परागत चली आ रही मुख्य पूजा चंदवंशीय प्रतिनिधियों द्वारा सम्पन्न कर बलिदान किये जाते हैं । मेले के अन्तिम दिन परम्परागत पूजन के बाद भैंसे की भी बलि दी जाती है । अन्त में डोला उठता है जिसमें दोनों देवी विग्रह रखे जाते हैं । नगर भ्रमण के समय पुराने महल ड्योढ़ी पोखर से भी महिलायें डोले का पूजन करती हैं । अन्त में नगर के समीप स्थित एक कुँड में देवी प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है ।

मेले के अवसर पर कुमाऊँ की लोक गाथाओं को लय देकर गाने वाले गायक 'जगरिये' मंदिर में आकर नंदा की गाथा का गायन करते हैं । मेला तीन दिन या अधिक भी चलता है । इस दौरान लोक गायकों और लोक नर्तको की अनगिनत टोलियाँ नंदा देवी मंदिर प्राँगन और बाजार में आसन जमा लेती हैं । झोड़े, छपेली, छोलिया जैसे नृत्य हुड़के की थाप पर सम्मोहन की सीमा तक ले जाते हैं । कहा जाता है कि कुमाऊँ की संस्कृति को समझने के लिए नंदादेवी मेला देखना जरुरी है । मेले का एक अन्य आकर्षण परम्परागत गायकी में प्रश्नोत्तर करने वाले गायक हैं, जिन्हें बैरिये कहते हैं । वे काफी सँख्या में इस मेले में अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं । अब मेले में सरकारी स्टॉल भी लगने लगे हैं ।


मेले

कुमाऊँ की संस्कृति यहाँ के मेलों में समाहित है । रंगीले कुमाऊँ के मेलों में ही यहाँ का सांस्कृतिक स्वरुप निखरता है । धर्म, संस्कृति और कला के व्यापक सामंजस्य के कारण इस अंचल में मनाये जाने वाले उत्सवों का स्वरुप बेहद कलात्मक होता है । छोटे-बड़े सभी पर्वों�, आयोजनों और मेलों पर शिल्प की किसी न किसी विद्या का दर्शन अवश्य होता है । कुमाऊँनी भाषा में मेलों को कौतिक कहा जाता है । कुछ मेले देवताओं के सम्मान में आयोजित होते हैं तो कुछ व्यापारिक दृष्टि से अपना महत्व रखते हुए भी धार्मिक पक्ष को पुष्ट अवश्य करते है । पूरे अंचल में स्थान-स्थान पर पचास से अधिक मेले आयोजित होते हैं जिनमें यहाँ का लोक जीवन, लोक नृत्य, गीत एवं परम्पराओं की भागीदारी सुनिश्चित होती है । साथ ही यह धारणा भी पुष्टि होती है कि अन्य भागों में मेलों, उत्सवों का ताना बाना भले ही टूटा हो, यह अंचल तो आम जन की भागीदारी से मनाये जा रहे मेलों से निरन्तर समद्ध हो रहा है ।

मेला चारे जिस स्थान पर भी आयोजित हो रहा हो, उसका परिवेश कैसा भी हो, उसका परिवेश कैसा भी हो, अवसर ऐतिहासिक हो, सांस्कृतिक हो, धार्मिक हो या फिर अन्य कोई उल्लास से चहकते ग्रामीणों को आज भी अपनी संस्कृति, अपने लोग, अपना रंग, अपनी उमंग, अपना परिवार इन्हीं मेलों में वापस मिलते हैं । सुदूर अंचलों में तो बरसों का बिछोह लिये लोग मिलन का अवसर मेलों में ही तलाशते हैं ।

कुमाऊँ मंडल के तीनों जिलों में सम्पन्न होने वाले कुछ प्रसिद्ध मेले इस प्रकार हैं - 

फलों के नाम

घरेलू फल
अखरोट, आलू, बुखार, अलूचा, आम, इमली, अमरुद, अनार, अँगूर, आड़ू, बड़हल, बेर, चकोतरा (इसे अठन्नी भी कहते हैं) चेरी (पयं), गुलाबजामुन, कटहल, केला, लीची, लोकाट, नारंगी, नासपती (गोल, तुमड़िया तथा चुसनी) नींबू, पांगर (chestnut ), पपीता, शहतूत (कीमू) सेब, खरबूज, तरबूज, फूट, खुमानी, काक, अंजीर आदि फल कुमाऊँ में होते हैं।


जंगली फल
आंचू (लाल व काले हिसालू), अंजीर (बेड़ू), बहेड़ा, बोल, बैड़ा, आँवला, बनमूली, बन नींबू, बेर, बमौरा, भोटिया बादाम, स्यूँता (चिलगोजा), चीलू (कुशम्यारु), गेठी, घिंघारु, गूलर, हड़, जामन, कचनार, काफल, खजूर, किल्मोड़, महुआ, मौलसिरी, मेहल, पद्म (पयं), च्यूरा, कीमू, तीमिल, गिंवाई आदि कुमाऊँ के जंगलों में होते हैं।

खेती-बाड़ी


खेती-बाड़ी का काम यहाँ पर प्राय: प्राचीन ढ़ंग से होता है। पहाड़ों की ढालों में काट-काटकर खेत बनाये गये हैं, जिनमें अनाज बोया जाता है। जहाँ कहीं हो सकता है, पर्वतीय नदियों से नाला काटकर नहर ले जाता हैं, जिन्हें 'गुल' कहते हैं। उनसे सिंचाई होती है। कहीं-कहीं पहाड़ की घाटियों में नदी के किनारे बड़ी उपजाऊ जमीने हैं। ये 'सेरे' कहे जाते हैं। जिस जमीन में पानी से सिंचाई नहीं हो सकती, वह 'उपजाऊ' कहलाती है। गाँव के हिस्से 'तोक, सार, टाना' आदि नामों से पुकारे जाते हैं।

यों तो खेती हल चलाकर होती है। किन्तु कहीं-कहीं ऐसी पर्वतीय जगहें हैं, जहाँ बैल नहीं जा सकते। वहाँ कुदाली (कुटल) से खोदकर खेती करते है । फसलें प्राय: दो होती हैं। तराई भावर में कहीं-कहीं तीन फसलें होती हैं। फसलों में जो-जो चीजें पैदा होती हैं, उनका ब्यौरा नीचे दिया गया है -

खरीफ
अनाज - धान, मडुवा, मानिरा, कौणी, चीणा, चौलाई या चुआ, उगल (फाफरा), मक्का।

तराई भावर में इनके अलावा ज्वार, बाजरा, गानरा आदि भी होते हैं।

दालें - उर्द, भट, गहत, रैंस, अरहर, मूँग । अरहर पर्वतों में नहीं होता।

तिलहन - सरसों, तिल, भंगीरा।

रबी
अनाज - गेहूँ, जौं, भावर में गानरा
दालें - मसूर, मटर (चना भावर तराई में)
तिलहन - अलसी, सरसों।

रुई यहाँ पर यत्र-तत्र कुछ होती है। फसल खरीफ के साथ भाँग भी बोई जाती है, जिसके पत्तों से चरस बनती है। इसके बीज पीसकर जाड़ों में तरकारी में डालकर खाये जाते हैं। ये बड़े गरम होते हैं। भागों के रेसों से रस्सियाँ तथा बोरी का कपड़ा बनता है।

गन्ना कहीं-कहीं पहाड़ों में भी होता है। अदरख, हल्दी, मिर्च, बहुतायत से बाहर भेजे जाते हैं। आलु व घुइयाँ (पिनालु) बहुत होते हैं। बंडे (गडेरी) ८-१० सेर तक होते हैं, और कलकत्ते तक भेजे जाते हैं।

तम्बाकु निजी खर्च के लिए कहीं-कहीं बोया जाता है।

लोगों की मुख्य गुज़र खेती से होती है। पर खेती लोगों के पास थोड़ी-थोड़ी बोने से सब बातों की गुज़र उससे नहीं होती, इसलिए लोग नौकरी करते हैं। तमाम भारत में, खासकर उत्तरी भारत में बहुत से लोग उच्च सरकारी व अन्य नौकरियों में फैले हैं।

कुमाऊँ में कुमाऊँ के लायक अनाज पैदा नहीं होता। तराई-भावर से अनाज पर्वतों को जाता है, किन्तु यह ज्यादातर नगरों को जाता है, जैसे नैनीताल, भवाली, रानीखेत, अल्मोड़ा मुक्तेश्वर आदि। देहात अन्न के बारे में प्राय: स्वावलंबी हैं।
 

कुमाऊँ की आलेखन परम्परा

कुमाऊँ का प्राचीन इतिहास अनेक कबीलों तथा विभिन्न संस्कृतियों को अपने आँचल में समेटे हुए है। कुमाऊँ में अल्पना तथा भिप्ति चित्रों का प्रत्यक्ष रुप व चलन चन्द शासन काल से होता है।

कुमाऊँ में चन्द वंश की स्थापना का सूत्रपात चम्पावत में सोमचन्द से आरम्भ होता है। सोमचन्द तथा उसके दश वंशजों का शासन ९७५ ई. से ११७८ ई. तक माना जाता है। इस काल की सबसे उल्लेखनीय घटना इन्द्र चन्द का चीनी राजकन्या से विवाह होना है। इस विवाह के कारण स्थानीय जनता ने विद्रोह कर दिया और उसे तथा उसके शासन काल में बाहर से आये हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय (राजपूत) लोगों को कुमाऊँ से बाहर भगा दिया। यह लोग २०० से २५० वर्ष तक कुमाऊँ में नहीं आ सके। परन्तु १३६५ ई. में उन्होंने पुन: काली कुमाऊँ में अपना राज्य स्थापित किया।

सबसे ध्यान देने वाली बात यह है कि यहाँ के प्रशासक अथवा शासक राजपूत वर्ग - महरा, फड़त्याल, जिन्ना, जलाल, मनराल, रोतौला, रजबार आदि में यह कला समृद्ध नहीं है और न उनके सांस्कृतिक जीवन का अटूट अंग। ऐपण व भिप्ति चित्रकला परम्परा कुमाऊँ में मात्र साह (साह) व ब्राह्मणों में ही अपने सम्पूर्ण विकसित स्वरुप तथा जीवन के समस्त सांस्कृतिक कार्यकलापों की गहराई की हद तक जुड़ी हुई है।

ब्राह्मणों में पंत व जोशी अपना मूल स्थान महाराष्ट्र व गुजरात मानते हैं। कहा जाता है कि सोम चन्द ८ वीं शताब्दी में गुजरात से ही आकर यहाँ बसा था। दूसरा मान्यता है कि सोम चन्द 'झूसी' इलाहाबाद का राजकुमार था और बैस राजवंश से सम्बन्धित था। तीसरी जनश्रुति कहती है कि सोम चन्द कन्नौज के शासक का भाई था, जो ज्योतिषियों की भविष्यवाणी के अन्तर्गत नये राज्य की कामना हेतु कुमाऊँ में आया था। उसका यहाँ आगमन उसकी बद्रीनाथ यात्रा के निमित्त हुआ था। तत्कालीन शासक ब्रह्मदेव ने अपनी कन्या का विवाह इससे किया और दहेज में चम्पावत के सुई क्षेत्र, दुर्ग तथा तराई की कुछ भूमि भी इसे प्रदान की। इस कथन का साक्ष्य कुमाऊँ क्षेत्र में घसने वाले 'साह' लोगों की इस मान्यता से होता है कि साह अपना पूर्व स्थान 'झूसी' इलाहाबाद को मानते हैं और आज भी साह लोग विशेष रुप से बढ़े-बूढ़े जब कभी प्रयाग व कुम्भ स्नान के लिए जाते हैं, तब झूसी में ही रहना सार्थक समझते हैं। दूसरी बात यह है कि कुमैया साह अपना पूर्ववर्ती स्थान चम्पावत को मानते हैं। इन सब बातों से यही विश्वास होता है कि 'साह' लोग चन्दों के साथ ही बाहर से आये।

ऐपणों व भिप्ति चित्रों, जिनको 'लिख थाप' या थापा कहते हैं, में अनेक प्रकार के प्रतीक व लाक्षणिक अन्तर दृष्टिगोचर होते हैं। साहों व ब्राह्मणों के ऐपणों में सबसे बड़ा अन्तर यह है कि ब्राह्मणों में चावल की पिष्ठि निर्मित घोल द्वारा धरातलीय अल्पना अनेक आलेखन प्रतीकों, कलात्मक डिजाइनों, बेलबूटों में प्रकट होती है। साहों में धरातलीय आलेखन ब्राह्मणों के समान ही होते हैं परन्तु इनमें भिप्ति चित्रों की रचना की ठोस परम्परा है। थापा श्रेणी में चित्रांकन दीवलों या कागज में होता है। यह शैली ब्राह्मणों में नहीं के बराबर है। जिन आलेखनों या चित्रों की रचना कागज में की जाती है। उन्हें प कहते हैं। इसी प्रकार नवरात्रि पूजन के दिनों में दशहरे का पट्टा केवल साह लोग बनाते हैं। विवाहोत्सव में विवाहित स्रियों के लिए विशेष प्रकार का कुसुमी पिछौड़ा (विशेष ओढ़नी) सारे कुमाऊँ में प्रचलित है परन्तु इनके निर्माण व रंगों की आभी साह व ब्राह्मणों में विशेष है। साहों के कुसुमी पिछौड़े विशिष्ट रंगों व प्रकाश के कारण तथा केन्देर स्थल के निर्माण के कारण सर्वश्रेष्ठ समझे जाते हैं और यही ब्राह्मणों के कुसुमी पिछौड़े के आलेखन व रंग आभा तथा साहों के कुसुमी पिछौड़े के रंगों के प्रयोग तथा केन्द्र के आलेखन का प्रबल लाक्षणिक अन्तर स्पष्ट करते हैं। ऐपणों में एक स्पष्ट अन्तर यह है कि ब्राह्मण गेरु मिट्टी से धरातल का आलेपन कर चावल के आटे के घोल से सीधे ऐपणों का आलेखन करते हैं परन्तु साहों के यहाँ चावल की पिष्टि के घोल में हल्दी डालकर उसे हल्का पीला अवश्य किया जाता हैं तभी ऐपणों का आलेखन होता है। ज्ञात हुआ कि उच्चकुलीन ब्राह्मणों में जो दीवानों की कोटि में आते हैं, वे भी 'बिस्वार' (चावल की पिष्ठि का घोल) में कच्ची अथवा सूखी हल्दी पीस कर डाल दी जाती है और पीली आभा युक्त ऐपण दिये जाते हैं।

साहों के यहाँ ऐपणों के अन्तर्गत एक और विशेष शैली है, जिसे 'वर' कहा जाता है। क्योंकि इसमें बूँदों तथा उनकी सँख्या द्वारा समान रुप से वरों व डिज़ाईनों का निर्माण किया जाता है। हर डिजाइन व अभिप्राय के लिए बूंदों की अलग-अलग संख्या निर्धारित है। प्रत्येक आलेखन विशेष ज्योमितीय अलंकरण, बूंदों की संख्या, विशेष रंग द्वारी निर्धारित व नामांकित है। पट्टे पर वर बूंद मुख्यत: उपासना या पारिवारिक पूजा गृह में ही सुशोभित रहते हैं। पर बूंदों का चित्रांकन पूजा गृह के अतिरिक्त भी दृष्टिगोचर होता है। यदि उनके निर्माण का कारण जाना जाय तो शत प्रतिशत यह तथ्य उजागर होता है कि अमुक समय में विवाह या यज्ञोपवीत संस्कार उस स्थान पर हुआ था, इसलिए वहाँ वरों का निर्माण हुआ था। थापा पट्टा शैली, ज्यूति मातृका इत्यादि शैलियाँ चम्पावत या संलग्न क्षेत्र में मात्र कुछ ब्राह्मण अथवा साह परिवारों के अतिरिक्त कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होतीं। अन्य इनका ज्ञान नहीं रखते। इन शैलियों की विगत १०० वर्षों से सुरक्षित अनेक रचनाएँ आज भी अल्मोड़ा, रानीखेत में हैं। इनका आलेखन आज भी उसी उत्साह व मान्यताओं के आधार पर होता है जो विगत शताब्दियों से था। प्रयुक्त संकेतों, कोणों, बिन्दुओं, चित्रकृतियों व विभिन्न अनुष्ठानों के लिए विभिन्न संख्या को बिन्दुओं द्वारा निर्मित यंत्र चौकियों के देखने से स्पष्ट होता है कि कुमाऊँ की इस कला में वज्र यानी, शैव व शाक्त तांत्रिक अवुष्ठानों व मान्यताओं का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा है।

रेखाचित्रों वाले पट्टों व ज्यूतियों में 'जैनशैली' जो अपनी प्रारम्भिक अवस्था में गुजरात में 'अपभ्रंश' शैली के रुप में विकसित व प्रतिष्ठित हुई थी, स्पष्ट रुप से दिखाई देती है। इसके अतिरिक्त राजस्थानी शैली, जो कि अपभ्रंश शैली का ही विकसित रुप थी व विशेष रुप से 'मालवा शैली', जो राजस्थानी शैली की ही एक धारा है, से भी विकसित होकर उभरी। इसका उदाहरण ज्यूति मात्रिका पट्टा, शेष शय्या (शेषनाग की शय्या पर विराजमान विष्णु व लक्ष्मी), महालक्ष्मी पट्टा, डोर दुबज्योड़ पट्टा, कृष्ण जन्माष्टमी पट्टा व नवदुर्गा पट्टा (नवरात्रि पूजन के समय) में दृष्टिगोचर होता है।

कुमाऊँ की ज्यूति मातृका पट्टों, थापों तथा वर बूदों में श्वेताम्बर जैन अपभ्रंश शैली का भी स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। श्वेताम्बर जैन पोथियों की श्रृंखला में बड़ौदा के निकट एक जैन पुस्तकागार में ११६१ ई. की एक ही पुस्तक में औधनियुक्ति आदि सात ग्रंथ मिले, जिनमें १६ विद्या देवियों, सरस्वती, लक्ष्मी, अम्बिका, चक्र देवी तथआ यक्षों के २१ चित्र बने हैं। इन ग्रंथ चित्रों में चौकोर स्थान बनाकर एक चौखट सी बनाई गई हैं और इनके मध्य में आकृतियाँ बिठाई गई हैं। ठीक इसी प्रकार का चित्र नियोजन कुमाऊँ के समस्त ज्यूति पट्टो, थापों व बखूदों में किया जाता है। कुमाऊँ में ज्यूति पट्टों में महालक्ष्मी, महासरस्वती व महाकाली ३ देवियाँ बनाई जाती है साथ में १६ षोडश मातृकाएं तथा गणेश, चन्द्र व सूर्य निर्मित किये जाते हैं। अपभ्रंश शैली में रंग व उनकी संख्या भी निश्चित है। जैसे लाल, हरा, पीला, काला, बैगनी, नीला व सफेद। इन्हीं सात रंगों का प्रयोग कुमाऊँ की भिप्ति चित्राकृतियों अथवा थापों व पट्टों में किया जाता है।

कुमाऊँ में प्रचलित मुख्य ऐपणों व चौकियों की सविस्तार चर्चा इस प्रकार की जा सकती है - 
सरस्वती पीठ - 
तीन प्रकार से बनाई जाती है। धरातल को पहले गेरु मिट्टी के घोल से लीप लेते हैं। फिर चावल पिष्ठिका (विस्तार) से रेखांकन किया जाता है। साह इसमें पीली आभा लाते हैं व ब्राह्मण विस्तार का रंग सफेद ही रहने देते हैं।

(अ) ९ (नौ) बिन्दुओं द्वारा इसका निर्माण होता है। इन बिन्दुओं को रेखा द्वारा इस प्रकार जोड़ा जाता है कि आठ (८) भद्र स्वरुप निकल आते हैं। यह कृति सरस्वती चौकी या अष्टदल कंवल कहलाती है। इसको बनाने के बाद ही इस पर देव प्रतिमाएँ स्थापित की जाती है।

(ब) सरस्वती पीठ में ९ (नौ) बिन्दु बनाये जाते हैं और इन्हें रेखा द्वारा इस प्रकार एक दुसरे से मिलाया जाता है कि ९ (नै) षोडश या स्वस्तिक बन जाते हैं। इस पीठ का निर्माण नवरात्रियों में देव स्थापना व पूजन हेतु किया जाता है।

(स) एक तारा का निर्माण किया जाता है। इसके ५ (पांच) कोण होते हैं। इसे स्वस्तिक यंत्र, पंच शिखा या पंचानन भी कहा जाता है। यह चिन्ह सृष्टि की रचना का सूचक है। इसके ५ कोण पांच तत्वों - पृथ्वी, जल, आकाश, वायु, अग्नि - के द्योतक हैं। महा उग्र तारा यंत्र भी ५ कोणीय या शिखा वाला होता है। इस यंत्र को जटा शंकरी भी कहा जाता है। मुख्यत: इसका प्रयोग अध्र्य स्थापना व देव स्थल के मुख्य दीया जलाने के समय किया जाता है। इसे निर्मित कर इसके ऊपर मुख्य दिये को रख दिया जाता है।

(द) सरस्वती या श्री यंत्र देवी चौकी २ (दो) समत्रिबाहु त्रिभुजों को एक दूसरे के विपरीत तथा ऊपर बैठाकर किया जाता है। इसमें ६ भुजाऐं तथा ६ कोण होते हैं। यह काली या नवदुर्गा पूजन के कार्य में निर्मित होती है।

महालक्ष्मी पूजन हेतु चौकी का निर्माण - इस चौकी का निर्माण ९ (नौ) बिन्दुओं द्वारा किया जाता है। सरस्वती चौकी अथवा अष्टदल कंवल की ही भांति होती है। अन्तर मात्र यह होता है कि चौकी के चारों ओर दो पाँवों की छाप बनाई जाती है। इसका आयोजन इस प्रकार होता है कि पाँवों की छाप एक अलंकृत बेल की तरह दृष्टिगोचर होती है। कहीं-कहीं कोई परिवार ८ (अष्ट) कोणीय कमल का निर्माण करते हैं।

जनेऊ पीठ - जनेऊ पीठ या यंत्र का निर्माण षट्कोण के अन्दर प्रत्येक भुजा पर आठ (८) बिन्दुओं का अंकन किया जाता है। इसी प्रकार मध्य भाग में बराबर दूरी में तथा समानान्तर ८ बिन्दुओं का अंकन किया जाता है। मध्य भागीय बिन्दुओं को रेखा द्वारा इस प्रकार जोड़कर व्यवस्थित किया जाता है कि रचना ७ श्री यंत्रों की छटा लिए हुए प्रकट होती है। इन्हें सप्तॠषि मण्डल कहा जाता है। यह हैं कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र तथा वशिष्ठ। इस सम्पूर्ण यंत्र के शीष में मुकुट तथा दाईं व बाईं तरफ २-२ हाथ अथवा कांगें तथा चरण पीठ बनाई जाती है। इस यंत्र को मां गायत्री देवी के रुप में चतुर्भुजी माना जाता है। इस यंत्र का निर्माण जनेऊ या उपनयन संस्कार के समय अत्यावश्यक होता है।

शिव पीठ यंत्र - इस यंत्र स्वरुप अल्पना का आलेखन १२न्१२ बिन्दुओं द्वारा, दूसरे प्रकार में १६न्१६ बिन्दुओं द्वारा किया जाता है। बाह्य धरातल को कुण्डी (ताम्र पात्र) के स्वरुप में अंकित किया जाता है। ईषाण व ऊषाण का अंकन होता है। यह श्रावण मास में शिव पूजन हेतु बनाई जाती है।

सूर्य चौकी - इसका निर्माण नामकरण संस्कार के बाद नव शिशु को बाहर प्रकाश में लाये जाने पर किया जाता है। इसके अतिरिक्त इसका निर्माण सूर्य व्रत के उपलक्ष्य में रविवार को पौष माह में भी किया जाता है। इसमें चन्द्र, सूर्य, शुक्र (विष्णु-लक्ष्मी), अठ जल (अष्ट कोणीय यंत्र), शंख, घंटा, कुण्डी या चक्र आसन, आरती, गड़ु़वा, धूपदान पुन: आसन निर्मित किया जाता है।

स्यो - नामकरण संस्कार के बाद छटी का चाक विसर्जन करने नौला जाते हैं। तब आंगन में स्यो का चित्रांकन अल्पना द्वारा होता है। ब्राह्मणों तथा साहों में अलग-अलग प्रकार का स्यो बनता है। ब्राह्मणों में कमल दलो का सिंहासन सदृश स्यो निर्मित होता है। सबसे नीचे ५ कमल पंखुड़ियाँ निर्मित की जाती है, उनके स्वर ४,३,२,१ के हिसाब से निर्माण होता है। ऊपर शीर्षमुकुट नीचे पद वेदी बनती है। साहों में स्यो कलश या गडुवे के रुप में बनता है।

नाता - साहों में नातों का निर्माण व मान्यता विशिष्ट है। नाते दो समय अथवा कालों में बनाये जाते हैं। इनका अलंकरण व रेखांकन केवल चूल्हे या भोजन कक्ष में होताहै। जो नाते चैत्र मास में बनाये जाते हैं उन्हें चैतु नाता कहते हैं। इसके बाद दीपावली में नातों को बनाया जाता है। यह भी ऐपण का प्रकार है जो केवल पीली मिट्टी के धरातल पर बिस्वार से अंकित किया जाता है। बाईं और विशिष्ट शैली में अंगुलियों की पोरों से ३ मानवीय आकृतियां बनाई जाती हैं जिनके हाथ एक दूसरे के हाथों को पकड़े हुए बनाये जाते हैं। यह सामंती युगीन मान्यता की अभिव्यक्ति है कि अमुक परिवार में भोजन कक्ष में ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य ३ सवर्ण जातियों के लोग ही भोजन खाने के अधिकारी हैं। दाईं ओर लक्ष्मी व नारायण का नाता रेखांकित किया जाता है जो पवित्रता व धन धान्य दाता व पालककर्त्ता समझे जाते हैं। मध्य में धान की बालियों के प्रतीक चिन्हों के अंकन द्वारा परिवार के सदस्यों तथा निकट सम्बन्धियों की संख्या दर्शाई जाती है। यह एक प्रकार से सम्मिलित परिवार की सदस्य संख्या का लेखा जोखा अंकित करता है। यह दो प्रकार से बनाये जाते हैं (अ) अल्मोड़ा शैली (ब) बागेश्वर शैली।

धुँया - इसका आलेखन दीपावली के दिन अमावस्या के बाद बड़ी एकादशी (१२ दिन के बाद) को किया जाता है। इसे बूढ़ी दीपावली कहते हैं। इसका आलेखन सूप में किया जाता है। इसकी कल्पना सूप से समान पंख युक्त पक्षी की होती है। कुछ लोग गरुढ़ आरुढ़ नारायण की बात इसके लिए कहते हैं। मान्यता है कि पारिवारिक क्लेश, दरिद्रता को दूर करने की कल्पना से इनका निर्माण होता है।

धूलि अध्र्य की चौकी - यह कमल के आकार की अल्पना है। इसका कलेवर गड़ु़वा (टोंटीदार कलश) की तरह अंकित किया जाता है। केन्द्र स्थल यज्ञ वेदी के समतुल्य अंकित किया जाता है। आड़ी तिरछी चार रेखाऐं बनाई जाती हैं, जो अरणी-भरणी यज्ञ काष्ठ की द्योतक होती है। इसका फैलाव केन्द्र स्थल से बाहर की ओर बढ़ता जाता है। अंकन के लिए कमल दल के प्रधानता दी जाती है। इसका स्वरुप गोलाई लिये हुए कलश की तरह बनाया जाता है। दोनों ओर २-२ हाथ की तरह फांगे अलंकृत हाथी की सूँड की तरह बनाये जाते हैं। इनके अन्तिम सिरे पर गगरी बनाई जाती है। यह विष्णु स्वरुप पवित्र समझा जाता है। शीर्ष के मुकुट व नीचे पाँवों की ओर पाठ निर्मित की जाती है। इसमें विष्णु प्रतीक शंख, चक्र, गदा, पद्म अंकित किये जाते हैं। विवाह की र सर्वप्रथम इसी से प्रारम्भ होती है। कन्या का पिता वर का स्वागत, चरण प्रक्षालन व अध्र्य दान संकल्प सहित, वर को इसी चौकी पर खड़ा करके कन्या का दान करता है तथा भेंट देता है।
अब उन चित्रांकनों का विवरण दिया जा रहा है जिनमें चावल पिष्ठिका घोल व गेरु का प्रयोग नहीं किया जाता वरन् विभिन्न रंगों - लाल, चटख लाल, हरा, पीला, नीला, बौजनी, काला व सफेद - को प्रयोग में लाया जाता है।

मुहाली, द्वार मातृ, माई तथा विजन - इनका निर्माण विवाहोत्सव में मुख्य द्वार के सौन्दर्यीकरण के लिये किया जाता है। माई, विजन व द्वार मातृ बुरी दृष्टि व अशुभ को दूर करने की कामना से चित्रित किये जाते हैं।

विवाह का ज्यूति पट्टा - इसमें महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती केन्द्र में बनाई जाती है। इनके साथ गणेश, सूर्य, चन्द्र व १६ मातृकाएं अंकित की जाती है। इन्हें चौकोर रेखिकीय चौखट में अंकित कर बाहर की ओर मछिया सिंगालिया अथवा खोडस वरों से अलंकृत किया जाता है। शीर्ष पर बड़े हिमालय व छोटे हिमालय का अंकन किया जाता है। इन सबके शीर्ष पर 'हलयाली बोट' - हरा पेड़ जो कल्पतरु माना जाता है, कमल (८ पंखुडियों वाला), शुक - सारिका (लक्ष्मी-नारायण) व दो हरे तोतों का निर्माण किया जाता है। राधा कृष्ण का चित्रांकन मनुष्याकृति में किया जाता है। शुकसारिका, शेष नाग की शय्या में लेटे हुए विष्णु व चरणों के पास लक्ष्मी तथा नाभि से उत्पन्न कमल पर ब्रह्मा की कल्पना को विशिष्ट रेखाओं द्वारा निर्मित किया जाता है।

यज्ञोपवीत का ज्यूति पट्टा - इसका निर्माण विवाह ज्यूति की ही तरह होता है। मुख्य अन्तर यह है कि शीर्ष पर विष्णु-लक्ष्मी या कृष्ण-राधा की मानवीय प्रतिमा का रेखांकन नहीं होता। दूसरा अन्तर है शीर्ष पर बाईं ओर सप्त ॠषि मण्डल का जनेऊ पीरु की तरह बनाया जाता है तथा दाहिनी ओर छापरी (भिक्षा पक्ष का निर्माण) किया जाता है। मान्यता है कि 'गिरह जाग' पर बालक चुन्डित मुन्डित हो एक कौपीन मात्र पहनकर ब्रह्मचर्याश्रम में प्रविष्ट करता है तथा विद्या अध्ययन के लिए काशी में अपने गुरु के पास जाता है। ब्रह्मचर्याश्रम में भिक्षा द्वारा ही अपना व गुरु पोषण का दायित्व वहन करता है। अध्ययन के उपरान्त उसका उपनयन व यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता है। अत: इस अवसर पर ज्यूति पट्टे की पूजा अर्चना की जाती है।

छट्टी की ज्यूति व सामान्य ज्यूति - यह ज्यूति पट्टा भी विवाह ज्यूति पट्टे की तरह ही होता है। परन्तु इसमें शीर्ष पर लक्ष्मी नारायण या राधकृष्ण की मानवीय अवयवों से युक्त प्रतिमा का आलेखन नहीं किया जाता है। बाकी अलंकरण व स्वरुप का विन्यास अन्य ज्यूतियों की तरह ही किया जाता है।

ज्यूति मातृका चौकी - इसका निर्माण काष्ठ चौकी को हल्दी से रंग दिया जाता है। इसमें समस्त अलंकरण लाल रंग की रेखाओं द्वारा निर्मित किये जाते हैं। इसमें न तो किसी प्रकार के 'वर' बनाये जाते हैं और न 'छज्जा' बेल को बनाया जाता है। अन्य सभी प्रतीक व अलंकरण विवाह ज्यूति की तरह ही होते हैं। इसमें भी लक्ष्मी नारायण या राधा कृष्ण की युगल मानवीय आकृति नहीं बनाई जाती।

जन्माष्टमी का पट्टा या थापा - सर्वप्रथम शिव पार्वती बनाये जाते हैं। उसके उपरान्त दशावतार निर्मित किये जाते है। शिव की जटाओं से गंगा व यमुना का उद्गम निर्मित किया जाता है। इसके उपरान्त कृष्ण की विस्तृत लीलाएं दर्शायी जाती हैं। इनकी अभिव्यक्ति पूर्णत: सुखसागर, भागवत के अतिरिक्त ब्रह्मपुराण व विष्णुपुराण के अनुसार होती है। इसमें गोवर्धन धारण इत्यादि को अंकित किया जाता है। चारों ओर सुन्दर गौ पुच्छ लता निर्मित की जाती है।

हरशयनी पट्टा - इस थापे में विष्णु को शेषनाग की शैय्या पर लेटा हुआ तथा चरणों को दबाते हुए लक्ष्मी दर्शाई जाती है। क्षीरसागर का निर्माण किया जाता है। प्रतीक रुप से नीले गहन जल में मछली तथा कछुवा और नाभि से उत्पन्न कमल व उस पर चार मुख वाले ब्रह्म रेखांकित किये जाते है। चारों ओर घंटी या लगुली बेल बनाई जाती है।

हर बोधिनी पट्टा - इसे तुलसी विवाह के अवसर पर मात्र लाल रंग से निर्मित किया जाता है। यह एक प्रकार की चौकी होती है। इसे १२ (बारह) बिन्दुओं से निर्मित किया जाता है। उसमें ४ भद व एक कँवल बनता है। इसे भी चारों ओर से सुन्दर लता व पुष्पों के निर्माण से भव्य रुप दिया जाता है। इसे 'बाल भद्र' के नाम से जाना जाता है।

दूर्वाष्टमी और डोर दुवज्योड़ा पट्टा - इसमें सात रानिया, एक नौला (जल भरने का कूप), नौले में बच्चा बनाया जाता है। बच्चे के एक हाथ में माँ के गले में पड़े तागे को पकड़ रखा है। यह तागा डोर कहलाता है तथा हाथ में भुज दण्ड की तरह ३ पल्ले का धागा औरतें धारण करती हैं। इन्हें दुबज्योड़ा कहते हैं। यह एक प्रकार से स्रियों द्वारा जनेऊ की तरह पवित्र समझकर धारण किया जाता है। इन पर २-२ चिड़ियाँ बैठाई जाती है। इसका निर्माण लोक कथा पर आधारित है।

ॠषिपंचमी व नागपंचमी पट्टा - इसमें वामनावतार (विष्णु) तथआ सप्त ॠषि बनाये जाते हैं। विशेष आकृति युक्त नाग जोड़े में होते हैं।

महालक्ष्मी का पट्टा - इसमें ३ छत्र बनाये जाते हैं। ८ पंखुड़ियों वाले कमल में चार भुजाओं वाली महालक्ष्मी को बनाया जाता है। बाईं तरफ के हाथों में चक्र व पद्म बनाया जाता है तथा दाईं तरफ के हाथों में त्रिशूल। नीचे ९ बिन्दु वाली सरस्वती चौकी या 'घृत कंवल' बनाया जाता है। लक्ष्मी के दोनों ओर दो-दो हाथी सूंड उठाकर जल कलश से लक्ष्मी का प्रक्षालन करते हैं। उसके नीचे दोनों ओर अठजल (जल कुण्ड आठ भुजाओं वाले) बनाये जाते हैं।

नवदुर्गा पट्टा - यह पट्टा साह वंश में ही प्रचलित है और कुमाऊँ की मान्यताओं, धार्मिक विश्वासों व अंकन शैली का प्रतीक है। इसमें मुख्यत: पीला, लाल, नीला, काला तथा हरा रंग प्रयोग में लाया जाता है। इसका धरातल पीला बनाया जाता है। उसके उपरान्त ही अन्य प्रतीक, आकृतियाँ तथा मंत्रों का आलेखन होता है। चौकोर या आयताकार पट्टे के चारों ओर सुन्दर किनारे का निर्माण किया जाता है। उसके उपरान्त ही मुख्य पट्टे का आलेखन प्रारम्भ होता है। इसका प्रयोग विशेषरुप से आश्विन मास की नवरात्रियों में भगवती पूजन व व्रत के लिए होता है।

कुमाऊँ में भिप्ति - चित्रण व अलंकरण की कोटि के अन्तर्गत वर-बूंद आते हैं, जो निम्न प्रकार के हैं - सूरजी वर, गुलाब चमेली वर, मुष्टि वर, अलमोड़िया खोडस, गलीची वर, विशिष्ट गलीचीवर, कटारी वर, २० बिन्दु का संगलिया वर, २२ बिन्दु का संगलिया वर, १६ बिन्दु का भद्र वर, १९ बिन्दु का भद्र, स्वास्तिक फूल या ६ फूल वर, २४ बिन्दु का, ६ फूल वर, २२ बिन्दु का, घौर तिलक ३७ बिन्दु का वर, हर हर मण्डल वर, ३७ बिन्दु का नींबू वर, ९ (नौ) बिन्दु का मछिया वर, खोड्स वर या खोड्स वर, २२ बिन्दु का, खोड्स वर २४ बिन्दु का, खोड्स वर ६ बिन्दु का, खोड्स वर १२ बिन्दु का।

कुमाऊँनी ऐपणों को अगर सूक्ष्मता से देखा जाए तो बोध होता है कि इन पर बंगाल का स्पष्ट प्रभाव है। भले ही कुछ प्रतीक व नाम शुद्ध कुमाऊँनी भाषा व क्षेत्र के ही हैं परन्तु पूर गठन बंगाल की अल्पना के प्रभाव से पूर्ण दिखाई देता है। १६वीं सदी के तारानाथ, जो तिब्बती इतिहासकार थे, द्वारा लिखित इतिहासकार से ज्ञात होता है कि ७वीं सदी में पश्चिमी भारत में 'भाखड़' से एक चित्र शैली प्रचलित हुई और ९वीं सदी से पूर्वी भारत में भी एक शैली का प्रचलन हो चला था। पहले नेपाल के चित्रकार पश्चिम भारतीय शैली में काम करते थे परन्तु बाद को उन्होंने पूर्वी शैली को अपना लिया। यह पूर्वी शैली ही आगे चलकर 'सेन' और 'पाल' शैली कहलाई। इस शैली में जहाँ चित्रों का निर्माण मात्र लाल, पीला, नीला, काला, सफेज, बैगनी रंगो में होता था, वहीं चित्रांकन उसी प्रकार होता था जिस प्रकार कुमाऊँ में लिख थापों व वर बूंदों में। बंगाल में सेन व पाल शासन में अनेक वज्रयानी (तांत्रिक) स्थविर प्रगट हुए तथा उस समय तांत्रिक बैद्ध (वज्रयानी) केवल नेपाल, बिहार तथा बंगाल में ही शेष रह गए थे और तिब्बत बज्रयानी लामावाद का दुर्ग बन चुका था। इसलिए कुमाऊँ के वर बूंद, जो १२ या १३ प्रकार के हैं, के विषय में कुमाऊँ की वयोवृद्ध जानकारों का कहना है कि यह कला भोट देश अर्थात् तिब्बत से आयी है। मान्यतानुसार शिव का स्थान कैलाश पर्वत तथा विष्णु का मानसरोवर दोनों भोट प्रदेश (तिब्बत) में हैं। इसी प्रकार शिव-पार्वती व विष्णु की पूजा अर्चना के लिए हर हर मण्डल व गौर तिलक का निर्माण किया जाता है।

कुमाऊँनी ऐपणों में चावल पिष्टि के घोल का प्रयोग करते हैं, उसी प्रकार बंगाल के ऐपणों का निर्माण व आलेखन होता है। बंगाल में कृषि विषयक लौकिक आचार तथा अनुष्ठान की अल्पना है। कुमाऊँ में भी इसी प्रयोजन के लिए लोक संस्कृति में हरेला, डिकरा, बिरुड़िया व डोर दुबज्योड़ पूजा का विधान व थापे तथा ऐपण हैं।

कुमाऊँ में लक्ष्मी व्रत व पूजा के लिए अल्पना द्वारा षट् कोणीय श्रीयंत्र का मध्य में निर्माण कर अथवा सरस्वती पीठ का निर्माण कर अष्ट दल कमल से घेर दिया जाता है। तत्पश्चात चारों सम्पूर्ण क्षेत्र को विभिन्न पुष्पों व लताओं के प्रतीकों से भर दिया जाता है।

कुमाऊँ में विवाहोत्सव अवसर पर रंगों द्वारा भी चित्रों का निर्माण किया जाता है जैसे - ज्यूति पट्टा (विवाह का), वर बूंद, मातृका चौकी (काष्ठ पर), पंच पात्रों (पांच प्रकार के बर्तन) व जाल के साथ भेंट की जाने वाली विवाह चौकी। यह वर व कन्या पक्ष दोनों बनाते है। 

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